Tuesday, November 6, 2012

४ नवम्बर,रविवार,र. के घर हम चार महिलाये मिले और साथ गुजारा एक प्यारा सा दिन बाकी तीनों हमसे उम्र के लिहाज से काफ़ी छोटी हैं.हमारे लिये लड़कियां ही हैं पर बहुत कुछ सिखाती हैं ये लड़कियां.सबके अपने अपने दर्द हैं,शारीरिक,भावनात्मक और जीने के लिये खासी जद्दोजहद भी है पर शिकायत नहीं है.न ये दर्द इतने बड़े हो कर सामने खड़े हो पाते हैं कि उनका काम करने का,चलते रहने का उत्साह मंद कर सके.
शायद उन्होंने बहुत पहले समझ लिया है कि अपनी तकलीफ़ें झेलने का सबसे नायाब उपाय है दूसरों की तकलीफ़ मे साझेदारी.ये तीनों ही किसी न किसी रूप में अपने समाज मे हाशिये में पड़े लोगों के लिये काफ़ी कुछ कर रहीं हैं और करते रहने की दिशा में सोचती भी रहती हैं.
मं.नारी से सम्बन्धित विभिन्न मुद्दों पर शोध और दस्तावेजीकरण का काम लम्बे अरसों से कर रही है.उसकी अपनी एक छोटी सी टीम है जो सर्वेक्षण आदि का काम भी करती है.अपनी संस्था के अंतर्गत इन्हीं विषयों से सम्बन्धित पुस्तकें भी प्रकाशित की है और एक पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित होती है.विगत कई वर्षों से शहर की कुछ मलिन बस्तियों मे बच्चों के लिये विद्यालय भी चला रही है.यहां बच्चों को शुरुआती दौर के शिक्षा दे उन्हें आगे के लिये अन्य विद्यालयों में दाखिला भी करवाती है.इसके अतिरिक्त अभी हाल ही में उसने अपने एक बहुत पुराने सपने को जमीन भी दी है--एक ऐसे घर की शुरुआत कर के ,जहां निराश्रित व्रिद्ध,एकल युवतियां और अनाथ बच्चे सब एक छत के नीचे रह सकें.
रा.  एक स्थापित संस्था की सचिव है ,जिसका बीज बोने के समय से ही वह संस्था के साथ है. वह देश के विभिन्न क्षेत्रों मे विभिन्न मुद्दों पर काम करती है पर मात्र कागजी कार्यवाही नहीं जमीनी रूप से भी वह इन मुद्दों पर काम करती है ,लोगों से जुड़ती रहती है.एक परिवार या  एक व्यक्ति के आधार पर भी उनकी सम्स्यायों का  निदान करने का प्रयत्न करती है.
अ. इस क्षेत्र में  विभिन्न  तरीकों से अपना योगदान देती है.कभी सीधे स्वंय काम कर के और कभी गांव आदि मे लोगों की एक क्षेत्रीय टीम को तैयार कर के,उन्हें प्रशिक्षित कर के इस लायक बना कर कि वे अपने क्षेत्र की समस्यायों को स्वंय हल कर सकें और उन्हे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य मे भी समझ सकें.
आज की बैठक का मुख्य मुद्दा था अ. की नयी संस्था की शुरुआत करना और उसके कार्य प्रारूप पर थोड़ा विचार विमर्श करना तथा अपने आपको टटोलना कि हमारी अपने आपसे क्या अपेक्षायें है,हमारी क्या क्षमतायें है और हम क्या और कैसे कर सकते हैं
सबसे अच्छी बात यह है कि एक ही क्षेत्र में काम करने के बावजूद एक दूसरे का साथ देने की भावना है और चीजें मात्र वैचारिक धरातल पर ही नहीं तैरती वरन उन्हें व्यवस्थित रूप से कैसे कार्यान्वित किया जाय इसका भी पूरा प्रयत्न किया जाता है .सपने विचारों का और विचार कार्यों का रूप लेते हैं यानि सपने सच होते हैं
काम सम्बंधी बातों के बाद सबने मिल कर खाना बनाया और एक साथ बैठ कर खाया.काम करते करते बतियाना,हंसी -मजाक जैसे नानी की चूल्हे वाली रसोई के दिन जिन्दा हो उठे.
खाने के बाद र.ने बहुत ही उम्दा चाय बना कर पिलायी और फ़िर हम वापस आने के लिये उसकी बालकनी पर थे.सामने था पार्क जिसमे उसकी कोलोनी के लोगों के साझा प्रयत्नों से पनपी व्यव्स्था और सुरुचि साफ़ दिखायी दे रही थी.एक तरफ़ करीने से  बनी सब्जियों की क्यारियों मे नन्हें- नन्हें पौधे मुलुक -मुलुक कर झाक रहे थे,दूसरी ओर घास लगाने के लिये पार्क साफ़ किया जा रहा था और किनारे लगे लम्बे पेड़ों के बीच से सामने था डूबते सूरज का आरक्त चेहरा.विदा लेते सूरज की नरम हथेलियां हौले हौले सहला रहीं थी हर चीज को, आशीर्वाद देती सी.
चौड़ी -खुली सड़क पर बतियाते हुये हम आये टैम्पो तक. इंजीनियरिंग कालेज चौराहे पर टैम्पो से उतर कर हम अपने -अपने रास्ते की ओर बढ ही रहे थे कि मं. को दिख गया सड़क किनारे कढायी मे धीमी धीमी आंच में उबलता मलाई वाला दूध और जब मन ललक ही गया था तो इच्छा तो पूरी करनी ही थी.हम,अ. और मं जा खड़े हुये वहां और फ़िर दूध के संग कुल्हड़ का सोंधापन भिगो गया भीतर तक.
गाड़ियों का शोर,बेतरतीब ट्रैफ़िक,चारों ओर चिल्ल्पों लेकिन इन सबके बीच भी कुलहड़ की महक और अपनेपन का साथ जैसे अचानक कंक्रीट की इमारतों के बीच दिख गये हों पीपल के नर्म ,मुलायम ,गुलाबी हरे से दो पत्ते.

Tuesday, October 16, 2012

एक सैर उजाले की ओर

कल से नवरात्री शुरू हुई और सबेरे का प्रारूप भी थोड़ा बदल गया.यूं भी सितम्बर के आते ही भीतर बाहर सब धीरे धीरे करवट ले उठ सा बैठता है; कुछ ताज़ा -ताजा,खिला-खिला सा.
सबेरे उठ कर ,नहाया -धोया और पौने छः बजे तक हम सड़क  पर थे .कल से टहलने मे मंदिर हो कर आना भी शामिल हो गया है ,इसलिये नहाना भी निकलने से पहले ही होने लगा है.सड़क किनारे लगे पेड़ों पर सफ़ेद गुच्छे वाले फ़ूल आने लगे हैं.हरी पत्तियों के बीच से झांकते सफ़ेद फूलों के लट्टू जैसे गुच्छे,नट्खट बच्चों के झुंड से कभी  हवा के संग और कभी आपस में चुहल कर रहे थे.देख कर मुस्कुराहट खुद ब खुद होंठो पर आ गयी.
और आगे बढे और हम अपने पसंदीदा हरसिंगार के नीचे थे.हलकी सी नम सुबह के धुंधलके में आहिस्ता आहिस्ता झरते हरसिंगार  को  जीना हमें हमेशा अपने भीतर की यात्रा की ओर मोड़ देता है.बाहर का सब कुछ -सड़क,आते जाते लोग,सर्र से निकल जाती इक्का दुक्का गाड़ियां सब जैसे आंखों के सामने होते हुये भी नहीं होते हैं. कितना वीतरागी होता है ये हरसिंगार भी-पूरे उठान पर होता है,समूचा खिला और ताजा -तरीन ,फ़िर भी बिना किसी न-नुकर के,डाल से अलग हो जमीन पर आ जाता है.क्या डाल पर लगे लगे ,हवा के संग इठलाने का उसका मन नहीं करता होगा ?जिस शांति और इत्मिनान से वह जमीन की ओर कदम कदम बढता है ,उसे देख यह भी नहीं लगता कि उसे जबर्दस्ती धकेलना पड़ता है.अपनी नियति को अपना  प्रारब्ध मान उसे कर्म सा अंजाम दे जाने का कितना अद्भुत समन्वय है.और भी एक बात है ,अगर ये हर्सिंगार के फूल यूं ही डाल पर लगे लगे मुरझाते और उसके बाद झरते तो क्या उसकी डंडी का चटक केसरिया रंग हमें यूं याद रह पाता.शायद तब हम जान भी नहीं  पाते कि उन नन्हें-नन्हें सफ़ेद फूलों के पीछे इतने रंग भरे छंद भी रचे हुये हैं.तो क्या हमारी सुबहों में अंजुरी भर रंग भरने को ही यूं मुस्कुराते हुये अपने अंत को गले लगाता है हरसिंगार और एक हम हैं कि सुबह सबेरे सैर को जायेंगे तो दूसरों के द्वारा पाले पोसे पेड़ों पर लगे फूलों को एड़ियों के बल उचक उचक तोड़ेंगे लेकिन जमीन पर बिछे हरसिंगार को पैरों तले रौंदते हुये चले जायेगे.इन्सान हैं न हम-जो पहुंच से थोड़ा दूर है,जो मुश्किल से हाथ आता है उसके पीछे भागेंगे लेकिन जो हमारे लिये सब कुछ सहर्ष न्योछावर करने को तैयार है उसकी कद्र नहीं करेंगे.
चलिये अब आगे बढते हैं.हां तो हमने हरसिंगार के नीचे बैठ फूल इकट्ठा किये .हमें यूं जमीन से हरसिंगार के फूल चुनना हमेशा बहुत अच्छा लगता है.एक एक फूल को पोरों पर मह्सूसना और फ़िर उन्हें अंजुरी में सहेजना.हर पल एक रेशमी एह्सास भीतर उगता है और मन कैसा तो तरल हो उठता है.
और फ़िर सबेरे की सैर का आखिरी पड़ाव-मन्दिर.दियों की लौ से बिखरता प्रकाश,हवा में घुलती धूप,अगर की खूशबू,मुर्तियों पर चढे रंग-बिरंगे फूल,पूजा-अर्चना करते,इधर उधर आते- जाते भक्त,कोई किसी कोने में ध्यान मग्न है तो कोई शंकर भगवान को जल चढाते हुये सस्वर पाठ कर रहा है.मन स्वतः ही पावन हो उठता है.हमने भी मां के सामने बैठ पाठ पूरा किया,तब तक आरती शुरू होने का समय हो गया था.पुजारियों ने कई कई बत्तियों वाले बड़े दिये हाथों में ले लिये. शंख की गूंजती ध्वनि,  घंटियों की जलतरंगी टुनटुनाहट, घंटों की टंकार और एक लय मे उठती गिरती तालियों की धुन के ऊपर छाये आरती के बोल--अपना आप कीचड़ से बाहर निकल आये कमल सा सुथरा और ताज़ा लगने लगा.
कोलोनी के द्वार पर ,सड़क के बीचों बीच शंकर भगवान की तकरीबन पन्द्रह फ़ीट ऊंची प्रतिमा के पीछे सुर्य भगवान चमक रहे थे.सड़क किनारे गेंदे के फूलों की दुकानें पीली-लाल रंगोली सी सज रही थी.बच्चे स्कूल के लिये निकलने लगे थे.एक और दिन हुलसता सा हमारे इन्तज़ार मे था.









१७.१०.२०१२
सभी छायाचित्र सुंदर अय्यर द्वारा.









Tuesday, January 10, 2012

हमारे पुरखे ...बरगद दादा

वो विशाल बरगद का पेड़ हमारे गाँव के मुहाने पर हुआ करता था.बड़ा बहुत बड़ा,हरा और छायादार पेड़ .पेड़ के नीचे उसके तने से सट कर एक छोटी सी मठिया थी .मठिया नहीं समझे? चलिए ,समझिये एक बहुत छोटा सा मंदिर जिसमे हमारे गाँव के बरम देवता बिराजते थे.बरम देवता ,ब्रह्म देवता का अपभ्रंश भी हो सकता है ,या फिर भैरव देवता भी बदलते बदलते बरम देवता हो गए हो शायद .खैर शुरुआत कुछ भी रही हो ,हमने जब उन्हें जाना वे बरम देवता थे और हमारे गाँव के गार्डियन एंजेल ,रक्षक ,सुखकर्ता ,दुखहर्ता सब थे .बरम देवता गाँव के रक्षक थे तो उन्हें पराक्रमी तो उन्हें होना ही था इसलिए थोडा गरम मिजाज, क्रोधी देवताओ में उनकी गिनती होती थी और ऐसे देवता पर छत्र से छाये रहते थे हमारे बरगद दादा.
किसी परिवार में कोई शुभ कार्य सम्पन्न होना होता तो सबसे पहले सब लोग जाते बरम देवता की देहरी पर माथा टेकने कि भगवन अपनी कृपा बनाये रखना .सारा कार्य बिना किसी विपदा ,बाधा के सकुशल संपन्न हो जाय और जाते जाते बरगद दादा के पैर पड़ .चक्कर लगा ,माथा टेक ये विनती करना न भूलते कि बरम देवता को संभाले रहियो. उस पेड़ की छाया में कुछ ऐसा सुकून था की निर्विघ्न सब कार्य पूर्ण होने की दिलासा और विश्वास खुद ब खुद मन में पसर जाता . कोई हारी बीमारी हो ,आफत ,विपत हो तो फिर दौड़े जाते देवता की देहरी और दादा की छाया की शरण तले .चबूतरे के नीचे बैठ सारी समस्या विस्तार से कही ,बताई जाती .देवता तो ऊपर से यूं ही निर्विकार नजर आते पर बरगद की झूलती जड़े और झुकी पत्तियां जैसे धीरे से सर हिला दुःख में शामिल हो जाती और पत्तियों की सरसराहट यह आश्वासन देती लगती कि घबराओ मत सब ठीक हो जाएगा.
और होता भी ,मनौतियाँ भी पूरी होती ,विपदाए भी दूर होती . गाँव में प्रवेश करने वाली कोई भी बैलगाड़ी हो या पैदल मुसाफिर उस पेड़ के नीचे सुस्ताये बिना आगे बढ़ने की तो सोच ही नहीं सकता .घर की देहरी भले न छुई हो पर बरगद की छाया में घर वापस आने की आश्वस्ति पा जाते थे हम .गाँव की कोइ भी लड़की विदा होती थी ,डोली बरगद के पेड़ के नीचे थोड़ी देर जरूर रुकती थी .गाँव मोहल्ले के लोग वहां तक बिटिया के साथ आते थे .बरम देवता की देहरी पर माथा टेक बिटिया बरगद से भी वैसे ही लिपट कर रोती थी जैसे अपने सारे सगे सम्बन्धियों से .बरगद दादा छूटे तो घर छूटा. कितनी बार इनकी झूलती जड़ो से लटक कर झूला झूला है ,गुडिया का ब्याह रचा कर उसकी डोली जब यहाँ लाते थे तो क्या पता था की इक दिन खुद अपने को भी ऐसे ही आना है.और उस विछोह के दुःख के संग रची बसी होती थी एक प्रार्थना दादा हमारे अम्मा -बाबू को संभालना और अगले ही सावन हमें जल्दी से अपनी छाओं में बुलाना . न जाने कितनी आँख मिचौली खेली जाती थी ,न जाने कितनी प्रेम कहानियां परवान चदती थी ,कितने मिलन कितने विछोह सबके गवाह थे दादा.
जाने वाली ही क्यों ,आने वाली भी हर डोली सबसे पहले दादा के चरणों में ही रुकती .महावर रचे पाँव जब पायल,झांझर छनकाते उतरते थे जमीन पर तो जैसे बरगद की मजबूत बाहे अपना आशीष भरा हाथ रख देती उस घूंघट लिपटे सर पर .लाल लाल चूड़ियों से कोहनी तक भरे हाथ जोड़ जब नयी आयी दुल्हन परिक्रमा करती थी तो मन ही मन अपनी सारी साधे,सारी इच्छाये दादा को पकड़ा देती और उनके पूरा होने का विश्वास आँचल की मूठ में बाँध चल देती थी नयी गृहस्थी बसाने ,एक नया संसार रचाने . बरगद का वह वृक्ष ,मात्र वृक्ष नहीं इतिहास का दस्तावेज था जो अपने सीने में अनुराग,विराग के असंख्य अध्याय समेटे खड़ा रहता था .न जाने कितने सपने इस विश्वास के चलते देखे जाते थे की वट वृक्ष तो है उन्हें पूरा करने के लिए .
और अभी कुछ दिन पहले एक लम्बे अरसे बाद हमारी मुलाक़ात हुई अपने उन्ही बरगद दादा से .अगर हमें बताया नहीं जाता तो हम उन्हें पहचान ही नहीं सकते थे .वो दूर तलक चारो और फ़ैली बलिष्ठ छतनार बाहे कलम कर दी गयी थी .चबूतरा थोड़ा बड़ा हो गया था और देवता का मंदिर भी आकार में बड़ा हो गया था .वट वृक्ष के दोनों और ऊंची इमारते थी जिनके निचले हिस्से में होटल ,चाय की दुकाने वगैरह खुल गयी थी .चबूतरे से सट कर पक्की सड़क निकल रही थी और कुछ आगे एक बस स्टाप बन गया था .सारी आपा धापी चिल्ल पों के बीच हमारे बरगद दादा कितने निरीह लग रहे थे .ऊपर को उठती उनकी कुछ डाले अब भी बरकरार थी .बरगद दादा में हमें एक झुर्रियों भरा कंपकंपाता चेहरा नज़र आया जो ऊपर को हाथ जोड़ भगवान से यह मांग रहा हो कि हे ईश्वर अब हमारी संतानों को हमारा होना धरती पर जगह घेरना लगने लगा है ,हमें अपनी शरण में ले लो .हमारा कल्प वृक्ष खुद कलप रहा था और हम उनसे लिपट रो लेने को थोड़ी तन्हाई खोज रहे थे.
'kalpvriksh 'is our mythological wish tree.

 
(picture © sunder iyer)

Wednesday, November 23, 2011

बनारस के विश्वनथ मन्दिर में मेरा एकान्त....

इस बार ,यानि सितम्बर २०११ में बनारस जाने पर बहुत सारा समय अकेले घूमने में बिताया.अकेले घूमना और अकेले बैठना हमें बहुत पसन्द है अगर हम प्रक्रिति के बीच में हैं.चूंकि यह समय बनारस हिन्दू युनीवर्सिटी के कैमपस में बिताना था ,इसलिये हम इसके प्रति उत्साही थे.और संयोग देखिये कि जिस विभाग में सुन्दर को काम था वह कैम्पस के विश्वनाथ मन्दिर के बहुत समीप था तो इधर सुंदर विभाग में होते और उधर हम मन्दिर में.

एक किताब हाथ में ले हम भगवान जी को हाथ जोड़ने के बाद मन्दिर के ऊपरी तल के पीछे वाले हिस्से में जाते और बस समय कैसे बीतता पता ही नही चलता.मन्दिर के पीछे क्या था ,यह तो पता नहीं पर वहां ऊंचे ऊंचे खूब हरे पेड़ थे.मन्दिर के पत्थर का लाल रंग और पड़ों का हरा मिल कर नीले आकाश तले ऐसी अर्ध चन्द्राकार रंगोली सजाते लगते की मन एक मीठी चुप में गुनगुनाने लगता.हम जगह बदल बदल कर बैठते कभी बरांडे में और कभी बाहर खुले में.खुले में बैठने पर हवा का अधिक आनंद मिलता और मन्दिर का साइड का हिस्सा अपनी पूरी ऊंचाई में दिखाई पड़ता.आकाश की ओर सीधी एकटक द्रिष्टी से ताकते मन्दिर के शिखर को देख हमे हमेशा लगता जैसे कोई तपस्वी एक टांग पर खड़ा हो अपने दोनों हाथ ऊपर को उठाये ,नमस्कार की मुद्रा में जोड़े.शिखर के एकदम ऊपरी टिप पर नजर गड़ा कर देखते रहने पर ऐसा लगता जैसे ऊपर पसरे नीले आसमान से कोई अपनी ओर खींच रहा है.जैसे केवल शरीर वहां बेंच पर रह गया हो और मन हवा के संग उड़ चला हो उस अजाने देश की ओर, उड़ता हुआ ऊपर और ऊपर.
कभी कभी हम सामने की ओर बैठ भजन सुनते थे.शांत एवं खुले खुले बरांडों में घुमड़ती गायक की आवाज के संग हार्मोनियम की धुन मन को बहुत शांति पंहुचाती.
नीचे वाले तल में भगवान शिव ,लिंग रूप में स्थापित हैं और उपारी तल में मूर्ति रूप में.इसके अतिरिक्त ऊपरी तल पर मां दुर्गा और भगवान राम के भी स्थान हैं.मन्दिर की दीवारों पर संगमरमर के पट्टॊं पर विभिन्न पौराणिक संदर्भ अंकित हैं,सम्पूर्ण गीता भी मन्दिर की दीवारों पर लिखी हुई है .










अपने साथ बिताये हुये ये पल हमें बहुत कुछ दे गये हैं जिन्हें शब्दों में बांध पाना हमारे लिये बेइन्तहा मुश्किल है.
(all mobile pics clicked by me) 

Wednesday, November 9, 2011

होली..२००८

इस होली
जीवन मे रंग छाये
ज्यूं
उगते सूरज का आकाश
कोमल गुलाबी ,नारंगी 
और चटक लाल


इस होली
मन मे इच्क्षा फ़ूले
ज्यूं
बासंती सरसों का खेत
नन्हीं नन्हीं ढेरों 
और नेक


इस होली
आंखो मे स्वप्न पले
ज्यूं
सीपी की मुट्ठी मे मोती
अपने होने से ही

कर दे रौशनी
 


इस होली
होठों पे गीत मचले
ज्यूं
रुनझुन रुनझुन
प्यासी धरती पर
मेह बरसे

इस होली 
नेह मे रिश्ते पगें
ज्यूं
नु के रंग
एक मन
एक प्राण
एक संग ....
इस होली में..............
                                                                 अबीर ,गुलाल सी रंगीन

                                                                   गुझिया सी मीठी और
                                                               फ़ाग सी मस्त हो ज़िन्दगी
                                                                                                 नमिता 

Monday, October 17, 2011

शिवपुर की वो शाम

पिछले महीने जब बनारस गये थे तो दो दिन गुडिया के घर शिवपुर में बिताये थे. ढेर सारी बातें और ढेर सारा खाना ,सहज आत्मियता में डूबे दिन थे.उस घर की छत खूब खुली खुली थी और आस पास का परिवेश ग्रामीण न होते हुये भी गांव की याद दिलाने वाला था.हम छत पर बैठे थे और उस खुली छत मे घिरती सांझ भी मन में कैसा तो उजाला भर रही थी.घर लौटती चिड़ियों की आवाज लोक गीत सी भीतर तक उतर रही थी.धीरे धीरे गहराते अंधेरे के साथ ही एक एक कर तारे मुडेंर पर आ,नीचे झांकने लगे थे. दूर तक नजर आते निष्कलुष आसमान के वे दूर देश के वासी तारे भी कितने अपने लग रहे थे और तभी दिखे मुट्ठी भर भर जुगनू.कितने अरसे बाद मुलाकात हुई थी जुगनुओं से.बगल के खाली प्लाट में उगे जंगली पौधों और झाड़ियों के बीच ऐसे टिमटिमा रहे थे जैसे रौशनी के फूल उग आये हो .सड़क पार के उस ऊंचे नीम के पेड़ पर तो जैसे पूरी बस्ती ही बस गयी थी जुगनुओं की.और फ़िर इक्का दुक्का जुगनू छत का भी चक्कर लगा गये.ऐसा लगा बहुत दिनों बाद किसी पुराने दोस्त से मुलाकात हो गयी हो.
इतने लम्बे समय बाद दिखे जुगनू हमे याद दिला गये बीर बहूटी की.वो जो हमारी बचपन की बरसातों का अटूट ,नर्मो नाजुक हिस्सा हुआ करती थी.नन्हीं सी लाल लाल ,मखमली सी बीर बहूटी बरसात होते ही गीली मिट्टी में न जाने कहां से उग आती थी और हम सब उसके बिल्कुल पास बैठे उसका धीरे धीरे चलना देखते रहते थे.वह हमारे लिये बरसात का एक नायाब तोहफ़ा हुआ करती थी.उसे ज्यादा से ज्यादा समय देखने के लालच में हम बिना ढक्कन की डिब्बियों में गीली मिट्टी बिछा उसे सावधानी से उसमे रख लेते थे .पता नहीं कहां चली गयी है बीर बहूटी अब.बचपन के बाद दिखलायी ही नहीं पड़ी.माटी शायद अब उतनी सोंधी नहीं रह गयी.देखो ,बीर बहूटी तुम तो नहीं आती अब पर अपने भीतर की डिबिया में माटी ,वही वाली माटी बिछाये हम अब भी तुम्हारा इन्तज़ार करते हैं.
ये जुगनू क्या दिखे कि अपने साथ न जाने कौन कौन से भूले बिसरे कोनो को उजियारा दिखा गये.अचानक याद आ गयी सर्दियों मे किताबों के पन्नों के बीच की वह ऊन की गुड़िया.तब तो बस अम्मा,चाची लोगों के हाथ के बुने स्वेटर हुआ करते थे.और हर सर्दी उधेड़ कर एक बार फ़िर कुछ नये ढंग से बनाये गये स्वेटर भी कितने गर्म हुआ करते थे.और सबके स्वेटर से उठते फ़ुन्नों को नोच नोच कर बनती थी वह गुड़िया.और हिन्दी लिखने की वह पीतल वाली निब ,जिसे हमारी तिवारी मास्टर साहब दीवार पर घिस कर तिरछा करते थे कि लिखते समय छपे अक्षरों जैसा फ़िनिश आये.और अंग्रेजी लिखने वाले जी निब.स्कूल के बगल वाले खाली प्लाट मे उगा लाल ,बैंगनी मकोई का जंगल और उसे खाने के लिये दीवार फ़ांदने की होड़.पता नहीं यह बचपन भी पुरानी होती दीवारों के बीच किस किस दरार से उग आता है.


pic by sunder iyer

Sunday, August 14, 2011

रात रानी की महक

हमारे छज्जे पर की रात रानी आजकल खूब फूल रही है. सांझ गहराते ही, उसकी महक हवा में घुलने लगती है. हवा का हल्का सा झोंका चला नहीं कि इसकी तन्वंगी काया लरज लरज उठती है और साथ ही खिल उठते हैं खुशबू के अनगिनत फूल. पास से गुजरने भर की देर है कि महमहाती खुशबू दामन थाम लेती है और हम अवश से इसके करीब बैठ जाते हैं, फिर होता है सपनीला अंधियारा, हल्के नशे में डुबोती गंध, एक मीठी चुप और अनाम सुख में आकंठ डूबे हम. कितनी सुखद अनुभूति है, सच शब्दातीत.कतरा कतरा महक रोम रोम में घुलती जाती है और हम आँख बंद किये किसी और ही दुनिया में होते है. अपना आप ज्यों बादल का टुकड़ा और धरती से दूर नक्षत्रो  तलक खिंच जाती है खुशबू की आकाश गंगा .हौले हौले डोलते हम अशरीरी हो उठते  है.हे ईश्वर  कितने सारे  तो खूबसूरत संबल दिए है तुमने हमें, फिर भी यह आदमी का मन न कातर होना छोड़ पाता है न शिकायत करना .
एक झाड़ और है रात रानी का जिसकी महक बरसों बाद आज भी मेरे भीतर तरो ताजा  है--पिथोरागढ़ की उस झंझावाती रात गेस्ट हाउस के बाहर घुप अँधेरे में अदृश्य रात रानी की  सर्वव्यापी महक. उस रात जब हमारी जीप पहाड़ के सकरे सर्पीले रास्तो पर पिथोरागढ़ की और बढ़ रही थी तो बादल यूं टूट कर बरस रहे  थे जैसे या तो वे खुद समाप्त हो जायेंगे या बाकी सब कुछ ख़त्म कर के दम लेगे. अन्धेरा इतना गहरा की जीप की हेडलाईट के परे बालिश्त भर आगे भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. मन में एक डर खदबदा रहा था कि बगल में सट कर चलती ऊंची ऊंची चट्टानों की कतारों में से किसी एक का मन अगर ऊपर से कूद जाने का हुआ तो...बस हम लोग उस डर को वहीं दाब देने की कोशिश करते. चट्टान तो नहीं पर रास्ते भर बादल के टुकड़े जीप के सामने रास्ता रोक रोक खड़े हो जाते थे.और हवा ...उफ़ जैसे छाती पर हाथ मार मार, बाल खोले, सिर पटक पटक विलाप कर रही हो. हम जैसे तैसे सही सलामत ठिकाने पर पंहुच गये और जब फ़्रेश हो, हाथ मे काफ़ी का प्याला ले गेस्ट हाउस के बराम्दे में आये तो बारिश थम चुकी थी और हवा में गुच्छा गुच्छा महकती रात रानी की गन्ध जैसे पूजा की थाली मे रखे प्रसाद सी मिली थी हमें...