हमें अच्छे लगते हैं अलस सुबह पौ फ़टने से पहले खुली हवा मे अपने साथ बिताये कुछ पल. खुली छत पर बस हम होते हैं, आहिस्ता आहिस्ता डोलती हवा और उपर छाया आसमान. आस पास की किसी छत पर कोई नही होता उस समय, ना ही कोई नज़र आता है नीचे सड़को पर. वे पल मेरे बेहद निजी होते हैं. हर सुबह होती है कुछ अलग. अब आज की ही बात लो. रात बारिश हुयी थी . तेज हवाये भी चली थी. सुबह नम थी और छत ठंडी. तलुवों से ठंडक धीरे धीरे उपर को चढ रही थी. हथेलियों मे बूंदे सहेजे हवा चेहरे को सहला रही थी और उपर छाये आकाश का रंग गाढा नीला था कुछ बैंगनी की ओर झुकता सा,और दिनों से बिल्कुल अलग. दो ऊंची छतो के बीच से झांकता पूरब के आकाश का वह कोना आज गुलाबी के बजाय हलके पीले रंग मे चमक रहा था. यूं तो महानगरो में आकाश को जीने का आनन्द बस मुट्ठी भर हो कर रह जाता है पर फ़िर भी नज़र भर आसमान देखने को मिलता है यही क्या कम हैं. खुशियों की तलाश में तमाम उम्र भी नाकाफ़ी हो सकती है और पल की खुशी भी उम्र के समूचे फ़लक पर छा सकती है.
Wednesday, April 13, 2011
एक सुबह.....
हमें अच्छे लगते हैं अलस सुबह पौ फ़टने से पहले खुली हवा मे अपने साथ बिताये कुछ पल. खुली छत पर बस हम होते हैं, आहिस्ता आहिस्ता डोलती हवा और उपर छाया आसमान. आस पास की किसी छत पर कोई नही होता उस समय, ना ही कोई नज़र आता है नीचे सड़को पर. वे पल मेरे बेहद निजी होते हैं. हर सुबह होती है कुछ अलग. अब आज की ही बात लो. रात बारिश हुयी थी . तेज हवाये भी चली थी. सुबह नम थी और छत ठंडी. तलुवों से ठंडक धीरे धीरे उपर को चढ रही थी. हथेलियों मे बूंदे सहेजे हवा चेहरे को सहला रही थी और उपर छाये आकाश का रंग गाढा नीला था कुछ बैंगनी की ओर झुकता सा,और दिनों से बिल्कुल अलग. दो ऊंची छतो के बीच से झांकता पूरब के आकाश का वह कोना आज गुलाबी के बजाय हलके पीले रंग मे चमक रहा था. यूं तो महानगरो में आकाश को जीने का आनन्द बस मुट्ठी भर हो कर रह जाता है पर फ़िर भी नज़र भर आसमान देखने को मिलता है यही क्या कम हैं. खुशियों की तलाश में तमाम उम्र भी नाकाफ़ी हो सकती है और पल की खुशी भी उम्र के समूचे फ़लक पर छा सकती है.
Monday, February 14, 2011
चामुन्डा देवी मे वो दोपहरी............
Monday, January 31, 2011
कालाटोप मे एक दिन..................
डलहौजी के पास कालाटोप गांव की वह सुबह जब भी याद आयेगी, मन को तरो ताजगी से भर जायेगी। नहीं केवल ताजगी से नहीं, उस दिन तो बाहर से भीतर तक की लम्बी यात्रा हुई।
रात जम कर बारिश हुई थी। दूर पहाड़ो पर बर्फ़ भी गिरी थी पर सुबह एकदम धुली-धुली निखरी हुई थी। मुख्य रास्ता छोड़ हम जैसे ही कालाटोप जाने वाली पगडंडी पर मुड़े तो जैसे बाकी सब केवल पीछे ही नहीं छूटा वरन धुल पुंछ गया। सर्पीली पगडंडी के एक ओर नीचे गहरी घाटी और दूसरी ओर पहाड़ियां। पहाड़ियों पर खड़े ऊंचे लम्बे चीड़ और देवदार के पेड़, इतने ऊंचे, इतने ऊंचे कि फ़ुनगी को देखने के लिये जमीन पर सीधा लेटने की जरूरत मह्सूस होने लगे। अन्तहीन ऊंचाई पर पसरा आसमान पेड़ों की फ़ुनगियों पर चुनरी सा टिका हुआ था। दूसरी ओर घाटी में भी इन पेड़ों का सघन विस्तार था, इतना घना कि नीचे झांकने पर धरती कहीं नज़र ही नहीं आ रही थी। घाटी में खड़े पेड़ों की फ़ुनगियां तो जैसे पहाड़ियों पर खड़े पेड़ों को चुनौती देने को लालायित दिख रही थीं पर उनका तना शुरू कहां से हो रहा था यह देख पाना भी सम्भव नहीं था। इतनी अतल गहरायी थी घाटी की। इन दोनों के बीच की पगडंडी मे खड़े थे हम। घाटी के पेड़ों के उस पार चमक रहा था सुबह का सूरज। सुई से पत्तों के सिरों किनारों पर पिछली रात की बरिश की बूंदे जड़ी हुई थीं और जंगल के बीच से छन कर आती सूरज की रौशनी में हीरों सी चमक रही थी। अद्भुत दृश्य था, वर्णनातीत, शब्दों की पहुंच से बहुत दूर।
हम दोनों के अलावा वहां उस समय कोई और नहीं था, निःशब्दता भी जैसे दूर से आती बांसुरी की धुन सी मन मे घुल रही थी। चारों ओर जंगल पर पसरी खामोशी डरा नहीं रही थी वरन गुनगुना रही थी। वैसे सन्नाटा था ही कहां, आहिस्ता आहिस्ता एक एक पांखुरी खोलते फ़ूल सा मन धीरे धीरे विस्तार पा रहा था। अनहद नाद की गूंज की शुरुआत सा कुछ करवट ले रहा था भीतर।
पगडंडी पर आगे बढे तो एक मोड़ पर पहाड़ियों की तरफ़ कुछ ऊंचाई पर छोटा सा घास का हरा भरा मैदान था जिस पर एक बेंच पड़ी हुई थी। हम कुछ देर के लिये उस पर बैठ गये। घाटी के जंगल में कहीं दूर एक चिड़िया बोली और चारों और पसरा मौन जलतरंग सा बज उठा। सुंदर उन दृश्यों को कैमरे मे कैद कर रहे थे और हम उन्हें भीतर तक उतार रहे थे। कच्ची पगडंडी पर हम और आगे चले। घाटी के जंगल से छन कर आती रौशनी की शहतीरें, नम अंधियारा और कोमल उजास मिल कर कुछ ऐसा तिलिस्म रच रहे थे कि लग रहा था कि यह बलखाती पगडंडी हमे ले जा कर किसी अनमोल खजाने के दरवाजे पर खड़ा कर देगी और सच ऐसा ही हुआ।
रास्ता जा कर खत्म हुआ वन विभाग के रेस्ट हाउस के गेट पर। गेस्ट हाउस के सामने से निकल थोड़ा नीचे उतर हम लोग जहां पहुचे वहां एक-दो छोटी चाय की दुकानें और कैन्टीन वगैरह थी। थोड़ा और नीचे उतर कर था दस बारह घरों का एक छोटा सा गांव और उसके बाद पहाड़ियां नीचे उतर सीधे घाटी मे समा गयी थीं। धुन्ध में लिपटी विस्त्रित घाटी के उस पार थी बादलों के लहराते आंचल के बीच से लुका छिपी खेलती बर्फ़ से सजी पहाड़ो की चोटियां, सूरज की रौशन उगलियां बर्फ़ पर ऐसे चमकते कसीदे काढ रही थी की अपना आप भी चमकता हुआ लगने लगा। खिलंदड़े बच्चों से इधर उधर भागते बादलो ने तो जैसे ठान रखा था कि वे पलक झपकाने का भी समय नही देंगे और हर पल एक नया दृश्य सामने लायेंगे।
हम चाय का कप हाथ मे ले बेंच पर बैठे सामने मंच पर घटित होता जैसे कोई नाटक देख रहे थे। इतनी तेजी से दृश्य बदलते थे, हर पल एक नया रूप सौन्दर्य का सामने होता था कि ठगे से बैठे रहने के अलावा कोई चारा ही नहीं था और फ़िर अचानक बादलों ने बरसने की ठान ली। मोटी-मोटी बूंदे टपकने लगी। हम भाग कर वन विभाग की एक इमारत के छायादार चबूतरे पर चढ़ गये और खंबे से टिक आसमान का धरती को अपने रस मे सराबोर करना देखने लगे और लो अचानक यह क्या....बारिश थमी और पूरी घाटी इस सिरे से उस सिरे तक इन्द्रधनुष से खिल उठी। इतना बड़ा इतना साफ़, अपने सतरंगे कलेवर में यूं मुस्कराता इन्द्रधनुष हमने इससे पहले कभी नहीं देखा था।
मेरा मन एकबारगी बच्चों के तरह किलका और लगा दोनो हाथ फ़ैला दौड़ते हुये जाएं और इन्द्रधनुष को अपनी बांहो मे भर लें, अप्रतिम.....अद्भुत......कितना कुछ दे गया वह दिन।
पर कालाटोप की यात्रा अधूरी रह जायेगी उस नन्हें से गांव के जिक्र के बिना। मुश्किल से दस बारह घर होंगे। नीची नीची छतों वाले छोटे-छोटे घर जैसे खिलौने से लग रहे थे। पर सब में ताले पड़े हुये थे। एक घर का तो ताला भी एक दरवाजे पर लगी कुंडी से उपर चौखट पर लगा था पर दूसरा दरवाजा शायद हवा से खुल गया था। चौखट के भीतर कुछ गिनती के बर्तन कुछ कपड़े लौट के आने वालों की राह देख रहे थे। सर्दियां बढने से पहले, बर्फ़ तेजी से गिरने से पहले इस गांव के लोग हर साल ऐसे ही अपने घरो को ताले लगा, उन्हे अपने ग्राम देवता के हवाले कर नीचे उतर जाते है। बर्फ़ पड़ने पर यह गांव पूरी तरह बर्फ़ से ढक जाता है। यहां तब रहना नामुमकिन हो जाता है। हम पर्यटक तो अच्छे मौसम में प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द ले वापस अपने घरो को लौट जाते हैं पर गांव के लोग बर्फ़ पिघलने पर फ़िर वापस आते हैं अपने घरों के दरवाजे छतें फ़िर ठीक करते हैं। सच कितना कठिन है ना साल दर साल यूं बिगड़ने बनने के दौर से गुजरना।
Thursday, August 13, 2009
६.२.८५. ..................इलाहाबाद से जबलपुर की ओर बढ रहे है.रेलगाडी की खिड़की से भागते हुये द्रिश्यो को आंखो मे भर मन मे उतार लेना प्रारम्भ से ही अत्यंत प्रिय लगता रहा है हमें और फ़िर इस रास्ते के द्रिश्यो से तो प्रथम मिलन है हमारा.वैसे भी मध्य प्रदेश की लाल बजरी,काले स्लेटी शिला खंड ,अपने चमकते घाघरे का घेर पकड़ कुशल नर्तकी की तरह पल पल बदलती मुद्राओ एवं भंगिमाओ का सम्मोहन बिखेरती उछल उछल चट्टानो के सीने पर पैर रख अपने नुपुरों की मधुर ध्वनि से पलाश के वन गुंजाने वाली जल धाराये हमे सदा से ही अपनी ओर एक अद्रिश्य डोर से बरबस खींचा करती हैं.
शंकरगढ की सीमा प्रारम्भ होते ही अचानक आंखो के सम्मुख एक साथ सैकड़ो ज्योति पुंज झिलमिला उठे.सफ़ेद सिक्ता के ऊँचे ऊँचे टीले सूर्य की सुनहली रश्मियों के स्पर्श से जगमगा उठे थे.बीच बीच में चमकने वाले कण तेज स्फ़ुलिंग की तरह झट से मुस्कुरा उठते थे .ऐसा लग रहा था अपनी स्वर्णिम किरणो की अंजुरी बांध सूर्य ने धरती के आंचल में असंख्य बहुमूल्य रत्न उड़ेल दिये हो.
और देखो तो कितनी तेजी से द्रिश्य परिवर्तन हो रहा है.कैसी अद्भुत नाट्य्शाला है प्रक्रिति की .अभी कुछ पल पहले आंखे सुनहले रुपहले प्रकाश एवं रंगो के रेशमी तन्तुओं पर फ़िसल रही थीं और अब है जैतपुरा का यह लाल गेरुआ चूनर मे लिपटा रंग बिरंगा रूप.ढेर ढेर गेरु के पहाड़.हरे चमकीले पत्तो से लदे पेड़ो के झुरमुट मे बसे घरो की चटक दीवारे,लाल छते.कैसा अद्भुत और प्यारा सम्न्वय है रंगो का.इतने प्यारे रंग ऐसी प्यारी आभा वाले तो बस प्रक्रिति के ही कैनवस मे द्रिश्टिगोचर होते हैं.
पलाश के जंगल............और करौंदे की फ़ूली झाड़ियां .हवा में खट्टी मीठी गंध घुल रही है.कोमल कोमल हरी पत्तियों के बीच दंतुली खोल भोलेपन से मुस्काते छोटे छोटे फ़ूल.करौंदे की झाड़ी कैसी रससिक्त लगती है.अजीब लगेगा शायद कि भला झाड़ी का रस से क्या सम्बंध,पर है रस भी और शक्ति भी.साफ़ सुथरे बंगलो के कुशल हाथो से सवांरे गये लान में लगे डेहलिया,रजनीगंधा और चम्पा में रस है तो पर इतना महत्व पूर्ण कहां जितना पत्थरों की संगत में कांटों की छातीसे लिपट मुस्काते इन करौदों के नन्हे नहे फ़ूलो मे.मन कैसा खुशी से उमगता है प्रक्रिति की इन सौन्द्रावलियों के बीच.मन करता है दौड़ कर जायें उस थिरकती जल धारा केसंग ताल मिला ढेर सारी रुपहली झांझरो के नुपुर बजा अपना लाल हरा आंचल उड़ा इतना नाचें इतना नाचें कि आत्मसात कर ले यह प्रक्रिति हमें अपने भव्य व्यक्तित्व में.बस यूं हे घुल जाय हम इन अनाम फ़िजाओ में.
Friday, March 27, 2009
भुलेश्वर मन्दिर भाग २
गर्भ ग्रिह जाने पर जो पहला कछ है उसमे पहले तीन ओर से दरवाजे थे .एक ओर का द्वार बंद कर दिया गया है पर एक सामने और एक बायी ओर खुलता द्वार अब है.इन द्वारो की बनावट तोरण के समान है.पुराने समय के लकड़ी के दरवाजो मे जो नक्काशी का काम देखने को मिलता है उतना ही बारीक काम यहां पत्थर पर है.सामने नन्दी का मंडप है ,जिसकी गोल चंदोवे वाली छत की नक्काशी बस देखते ही बनती है.हमने देखा कि यहां नन्दी का चेहरा ठीक शिव जी की ओर सीधे देखते हुए नही था वरन थोड़ा सा दाहिनी ओर को मुड़ी हुई द्र्ष्टी थी.पर हमने देखा कि नन्दी का चेहरा पीतल की पट्टियो और चेनों से ढका है.हमने अनुमान लगाया कि शायद नन्दी भी विध्वंश के शिकार हुये होगे और पुनः स्थापन के दौरन ऐसा हो गया होगा. इस मन्दिर मे हुई तोड़ फ़ोड़ को देख कर बहुत दुख होता है पर साथ ही उन शिल्पियो के प्रति मन श्रद्धा से अभिभुत हो जाता है.कितनी बेजोड़ थी उनकी कला की इतनी तहस नहस के बावजूद अपना सौन्दर्य संजो कर रखे हुए है.
मन्दिर की दीवारो पर रामायन ,महाभारत से सम्बन्धित चित्र उकेरे हुये है.बाणों की शैया पर भीष्म पितामह,महाभारत के युद्ध मे दोनो ओर से होती बाणो की वर्षा,रथ,अस्त्र-शस्त्र,राम भरत मिलाप का दृश्य,हाथी घोड़े उंट गरज यह कि हमारे अनेको पौराणिक संदर्भ छेनी हथौड़ी से लिखे हमारे सामने थे.शब्द कितने बेमानी हो उठते है ऐसे मे.मन्दिर के इस मुख्य हिस्से की बाहरी दीवारो की सरंचना सच अद्भुत.जैसे घड़ी के डायल मे घंटो के नम्बर के बीच मिनिट की छोटी रेखाये होती है कुछ इसी तरह गर्भ ग्रिह की बाहरी दीवारो पर पांच चौड़े खम्बो के बीच कै पतले पतले खम्बे और हर खम्बे पर नृत्य की मुद्रामे अभिसारिकाये .इतनी बारीक तरीके से उकेरी गयी है ये मुर्तिया कि उनका अप्रितिमशारीरिक सौष्ठव जैसे आंखो के सामने साकार होने लगता है .पर सारी मुर्तियां खंडित है.शायद ही किसी मुर्ति का चेहरा,हाथ और पैर साबुत हो लेकिन इसके बाव्जूद उनका आकर्षण अद्वितीय है.उनके आभूषण हमारे सम्रिद्ध अतीत की और न्रित्य की भंगिमाये कला की गवाह है.वैसे न्रित्य की मुद्रा मे नारी मुर्तियो को देख हमे याद आ गया कि हमारी मान्यता के अनुसार पार्वती जी ने भी इस स्थान पर न्रित्य किया था.शंकर के चारो ओर ये किसकी स्मृतिया है.
मन्दिर के मुख्य हिस्से के तीन ओर छाया दार गलियारे है.इन गलियारो और मन्दिर के बीच सकरी सी खुली जगह है जहां से आसमान दिखायी पड़ता है और सूरज की किरणे गर्भ गृह की बाहरी दीवारों पर पड़ती रहती है.क्या खम्भो पर पड़ती रौशनी से कभी दिन के चढने उतरने का अंदाजा लगाया जा सकता रहा होगा.ये गलियारे भीतर की ओर खम्बो पर टिके हैं और ये स्तंभ भी बहुत कलात्मक है.बीच बीच मे बाहरी दीवरो पर बाहर की ओर खुलते गवाच्छ है जिन्से ठंडी हवाये लगातर आती रहती है.
मन्दिर का उपरी हिस्सा सबसे अलग लगा हमे.यह बेसाल्ट पत्थर का नही वरन लाइम्स्टोन का बना हुआ है मन्दिर के भीतर ,गलियारो के बीच की खुली जगह से देखने मे जो हिस्सा दिखायी पड़ता है वह उपर को जाता नुकीला सा मन्दिर के विमान सा ही लगता है किंतु बाहर से इसका आकार बिल्कुल अलग सा लगता है.इस हिस्से मे भी अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है.
हमने यहां काफ़ी समय बिताया .सच पूछिये तो जी फ़िर भी भरा नही था .मन्दिर के बाहर कुछ दूरी पर बने दीप स्तम्भ,कुछ और इधर उधर बिखरी इक्का दुक्का इमारते,किले के ढहते बुर्ज सब किसी सम्रिद्ध अतीत के उजड़ते वर्तमान की गाथा कह रहे थे पर इस सबके बीच अंधियारे के बीच दिये की जगमगाती लौ सा दिपदिपा रहा था भोले बाबा का आवास ,विश्वास का सम्बल हमारे हाथ मे थमाता.
भुलेश्वर मन्दिर..दीवारो पर रचे छंद..भाग १
तो शहर का छॊर खत्म होते ही सड़क के दोनो ओर फ़ूल पौधो की नर्सरी और फ़िर अंगूरो के बाग शुरु हो जाते है.दूर घेरा बांध खड़ी पहड़ियो के बीच एक पहाड़ी पर मन्दिर का आकार हाइवे से ही दिखने लगता है.धुंध मे लिपटा .आगे जा कर दाहिने मुड़ कर सड़क छुट्पुट बिखरे गांव के बीच से हो कर गुजरती है और फ़िर शुरु हो जाता है पहाड़ियो पर चढाई का सिल सिला.बारिश का मौसम होता तो सारी पहाड़ियां हरियाली से लदी होती.घाटियों से ले कर चोटियो तक बादल भाग दौड़ कर रहे होते और हो सकता है कई झरने भी उछल कूद करते दिख जाते .यकीनन प्रक्रिति का यह श्यामल रूप मंत्रमुग्घ करने वाला होता पर इस समय यानि गर्म मौसम मे मन्दिर तक पहुंचने का अपना एक अलग सुख है जिसकी चर्चा हम बाद मे करेगे .अभीतो हम रास्ते पर ही हैं.इस समय ऊपर चटक नीला आसमान था और नीचे पहाड़ियों पर भूरा सुनहला रंग बिखरा था. सुखी हुई वनस्पति का रंग पकी हुई गेंहू की बाली सा था और बीच बीच मे बड़े पेड़ जो अपनी हरीतिमा को बरकरार रखे थे.पर अपनी इस सफ़लता पर ना झूम रहे थे ना इठला वरन स्थितप्रग्य धीर मनस्वियों से खड़े थे,शांत ,धीर गम्भीर जैसे कह रहे हो देखो जितनी गहराई से अपनी माटी से जुड़े रहोगे मन का रस उतना ही बचा रहेगा.रास्ते के घुमावों चढाई उतार के बीच मन्दिर की झलक मिलती रहती है.
भुलेश्वर मन्दिर के चारो ओर कभी एक किला था.अब यह तो हमे ठीक ठीक नही मालूम की मन्दिर पहले बना कि किला पर हां मन्दिर समय की मार और मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवर्तियों का शिकार होने के बावजूद आज भी अपनी समूची गरिमा के साथ स्थापित है पर किले के अवषेशों के नाम पर केवल दो ढहते हुए बुर्ज ही बचे हैं.कुछ जानकारों के अनुसार किला सोलहवी शताब्दी मे बनवायागया था.यानि मन्दिर के बाद मे.सच ही तो है नश्वर तो मानव होता है इश्वरीय सत्ता तो अजर अमर है.इस किले को दौलत मंगल गढ या मंगलगढ के नाम से जाना जाता है.
मन्दिर को तेरहवीं शताब्दी मे चौला वंश के राजाओ ने बनवाया था.मन्दिर के विषय मे पौराणिक मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां देवी पार्वती ने भगवान शंकर के समुख न्रित्य किया था और यहीं से दोनो ने सीधे कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर विवाह सम्पन्न किया था.मन्दिर स्थापत्य कला एवं पत्थरों पर करीगरी का एक अनुपम खजाना है.मन्दिर का निर्माण हेमादिपथ स्थापत्य कला के अनुसार हुआ है.कहते है कि चौला राजवंश के एक प्रतिभा शाली मंत्री ने इस पद्धति की शुरुआत की थी.महाराष्ट्र मे इस स्थापत्य पद्धति के अंतर्गत निर्मित कई प्रसिद्ध मन्दिर है.आस पास पाये जाने वाले काले रंग के बेसाल्ट पत्थर और लाइम स्टोन से निरमित है यह मन्दिर.
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोमुखी तरीके से यानि कि छिपा हुआ बना है.कुछ लोगो का मानना है कि तेरहवीं शताब्दी मे इस प्रकार के प्रवेश्द्वार नही बनते थे .शायद विध्वंश के दौरान पहले वाला द्वार नष्ट हो गया होगा और बाद मे शिवा जी के काल मे इसका पुनः निर्माण हुआ होगा.
आज मन्दिर एक उंची पहाडी पर है.मन्दिर तक गाड़िया आसानी से पहुंच जाती हैं .कोई सात आठ सीढीया चढ कर एक लम्बे चौड़े खुले चबूतरे पर पंहुचते है.भरी दोपहर मे भी यहां हवाये ठंडी और सुखद थी.मन्दिर के प्रवेश द्वार के सम्मुख लोहे के गर्डिल पर एक विशाल घंटा लगा है.मन्दिर मे घुसते ही एक सपाट बड़ा कमरा है जिसके पीछे वाली दीवार पर एक सकरा दरवाजा है.इस छोटे से द्वार मे घुसते ही दाहीनी ओर सकरी थोड़ी अनगढ सी सीढीया उपर जाती है और यहीं से शुरु हो जाता है नीम अंधेरे,रौशनी,आत्मा तक पहुचने वाली ठंडक और मुखर पाषाणो के बीच आपका सफ़र.
Saturday, December 27, 2008
हमें मन्दिर का ठीक ठीक पता नही था,पर निकल पड़े थे तो मिल तो जायेगा ही.फ़ूड बाज़ार तक का आटो किया और फ़िर सीधे पैदल चलना शुरु किया.यह अच्छा है कि हम लोग जब बाहर यूं ही घूमने निकलते है तो बहुत सुविधाये हमे नहीं चाहिये होती हैं. मौसम भी हमे परेशान नहीं करता ,चाहे उसका मिज़ाज कैसा भी हो.ठीक है शारीरिक थकावट वगैरह तो होना स्वाभाविक है पर हम मन से मस्त रहते है और ऐसा हम दोनो के ही साथ नही है, वरन बच्चे भी घूमना ऐसे इन्ज्वाय करते है.हां तो कुछ दूर ही पैदल चलने के बाद पहाड़ी पर मन्दिर दिखना तो शुरु हो गया पर उस तक पहुंचने का रास्ता नज़र नहीं आ रहा था.पूछते पाछ्ते हम बाणेर गांव की उस गली तक पहुंच ही गये जहां दो घरो के बीच की जगह से ऊपर को जाती सीढीयां दिखायी दी.हमारी उत्तरां चल की यादें ताज़ा हो गयीं वहां भी एक दूसरे से पीठ टिकाये ऐसे ही छोटे छोटे घरो के बीच से सकरा सा रास्ता फ़ूटता था और कभी ऊपर पहाड़ो को और कभी नीचे गुफ़ाओ को जाती सीढीया किसी मन्दिर तक ले जाती थी.
सीढीया चढते हुये हम कल्पना करते जा रहे थे कि बारिश के मौसम मे यह जगह कितनी खूबसूरत लगती होगी.पहाड़ी हरियाली से भरी हो तो हवा में ताजगी अपने आप ही घुल जाती है.खैर इस समय भी कुछ बड़े ,कुछ छोटे पेड़ पहाड़ी पर फ़ैलते भूरेपन की एकरसता तोड़्ने का भरसक प्रयास कर रहे थे और कामयाब भी हो रहे थे.चढाई की शुरुआत में ही एक गुफ़ा में भी मन्दिर है शिव जी का -बाणेश्वर महादेव.पर हम लोग पहले ऊपर वाले मन्दिर गये.शायद पहले कोई पुराना छोटा मन्दिर या मठिया रही होगी जिसका जीर्णोद्धार हो रहा है.अभी मन्दिर बन रहा है.साफ़सफ़ाई करने वाले तो है पर कोई पुजारी जी वगैरह दिखलाई नही पड़े .हो सकता है कि त्योहारों और पूजा पाठ वाले मौसम मे ही अभी रहते हो.यह मन्दिर तुकाई माता के मन्दिर के नाम से जाना जाता है.इन देवी के अवतार के विषय मे कोई बताने वाला तो वहां था भी नहीं और अंडाकार चिकने पत्थरो मे सत्यनारायण के दर्शन कर लेने वाले हमारे मन को कहाँ फ़र्क पड़ता है कि देवी का नाम क्या है और वे कहां से अवतरित हुईं.
मन्दिर में बेइंतहा शान्ति थी.खिड़्कियों से अंदर आती सूर्य की किरणॆ धूप छांव का एक करिश्माई संसार रच रही थी चारो ओर से आती ठंडी हवा बहुत सुकुन दे रही थी.सड़क की ओर खुलते मंदिर के छज्जे से नीचे दूर दूर तक फ़ैला शहर दिख रहा था.जो इमारते नीचे से आकाश को छूती लगती है वही इस ऊंचायी से माचिस की डिबिया सी लग रही थी.नहीं मन्दिर बहुत ऊंचाई पर नहीं है पर शायद यह भौतिकता से आध्यात्मिक निर्मलता की दूरी हो.बस कुछ कदम और मन किसी दूसरे लोक मे ही होता है.
मन्दिर के पीछे की ओर दूर तक बची खुची पहाड़ियो का सिलसिला है.दूर एक और छोटा मन्दिर भी दिखायी पड़ता है.उस मन्दिर से इस मन्दिर तक आने जाने का रास्ता भी है.कुछ लोग आ जा भी रहे थे पर हम लोग नहीं गये.पहाड़ियो के पहले कुछ और बनती इमारतो के ढांचे,अपनी अपनी सरहदें और इन सब के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते इक्का दुक्का खेत.थे एक ही दो पर सच पूछिये तो चारो ओर फ़ैले सीमेंट,कंक्रीट पर भारी पड़ रही थी,आंखे जुड़ाती उनकी हरियाली.हम कितने भी झंडे गाड़ ले अपनी प्रगति के पर प्रक्रिति का इक नन्हा सा भी कतरा हमे जता देता है कि सर्वोपरि तो वही है जो सहज है स्वाभाविक है.
नीचे आ कर हम गुफ़ा में शंकर भगवान के मन्दिर में गये.पुरानी सदी की कुछ मुर्तियां,कुछ खंडित ,कुछ साबुत एक किनारे रखी हुई थी.भीतर छोटी सी जगह में शिवलिंग स्थापित है.नीम अंधेरी गुफ़ा में कोने में दिया जल रहा था.उस प्रकाश में सब कुछ भुला अंतस में भक्ति की अलख जगाने की शक्ति थी.हम लोग बहुत देर तक वहां बस चुपचाप बैठे रहे.सुंदर ने उस स्थान को चित्रो में सहेजा और फ़िर हम वापस आ गये.वहीं चौड़ी सड़क पर भागते वाहन,ऊंची इमारते,बड़ी दुकाने.लेकिन सब कुछ नया सा लग रहा था.ऐसा ही होता है.रोज एक ढर्रे से चलती जिन्दगी के बीच हम जब कुछ समय थोड़ा अलग ढंग से गुजार लेते है तो ताजादम हो एक बार फ़िर जद्दोजहद के लिये तैयार हो
जाते है.कुछ मुश्किल भी नही होता ऐसा कर पाना बस अक्सर हमी अपने आपको तैयार नहीं कर पाते.कहीं बाहर निकलना भी शायद इतना जरूरी नहीं होता .हां कुछ समय अपने साथ गुजारना बहुत जरूरी है.
मन्दिर के भीतर
