यूं तो नया भी बहुत कुछ है लिखने को पर कभी कभी लगता है पुरानी यादो को भी सहेज के रखते ही चले .डायरी के पुन्ने तो पीले भी हो चले है और भुरभुरे भी इसीलिये उन्हे यहां उतार रहे है.और फ़िर जो स्थान आज से २४ साल पहले जैसे थे आज वैसे तो नही ही रह गये है तो उनका वह स्वरूप भी सहेज लेना चाहते है.
६.२.८५. ..................इलाहाबाद से जबलपुर की ओर बढ रहे है.रेलगाडी की खिड़की से भागते हुये द्रिश्यो को आंखो मे भर मन मे उतार लेना प्रारम्भ से ही अत्यंत प्रिय लगता रहा है हमें और फ़िर इस रास्ते के द्रिश्यो से तो प्रथम मिलन है हमारा.वैसे भी मध्य प्रदेश की लाल बजरी,काले स्लेटी शिला खंड ,अपने चमकते घाघरे का घेर पकड़ कुशल नर्तकी की तरह पल पल बदलती मुद्राओ एवं भंगिमाओ का सम्मोहन बिखेरती उछल उछल चट्टानो के सीने पर पैर रख अपने नुपुरों की मधुर ध्वनि से पलाश के वन गुंजाने वाली जल धाराये हमे सदा से ही अपनी ओर एक अद्रिश्य डोर से बरबस खींचा करती हैं.
शंकरगढ की सीमा प्रारम्भ होते ही अचानक आंखो के सम्मुख एक साथ सैकड़ो ज्योति पुंज झिलमिला उठे.सफ़ेद सिक्ता के ऊँचे ऊँचे टीले सूर्य की सुनहली रश्मियों के स्पर्श से जगमगा उठे थे.बीच बीच में चमकने वाले कण तेज स्फ़ुलिंग की तरह झट से मुस्कुरा उठते थे .ऐसा लग रहा था अपनी स्वर्णिम किरणो की अंजुरी बांध सूर्य ने धरती के आंचल में असंख्य बहुमूल्य रत्न उड़ेल दिये हो.
और देखो तो कितनी तेजी से द्रिश्य परिवर्तन हो रहा है.कैसी अद्भुत नाट्य्शाला है प्रक्रिति की .अभी कुछ पल पहले आंखे सुनहले रुपहले प्रकाश एवं रंगो के रेशमी तन्तुओं पर फ़िसल रही थीं और अब है जैतपुरा का यह लाल गेरुआ चूनर मे लिपटा रंग बिरंगा रूप.ढेर ढेर गेरु के पहाड़.हरे चमकीले पत्तो से लदे पेड़ो के झुरमुट मे बसे घरो की चटक दीवारे,लाल छते.कैसा अद्भुत और प्यारा सम्न्वय है रंगो का.इतने प्यारे रंग ऐसी प्यारी आभा वाले तो बस प्रक्रिति के ही कैनवस मे द्रिश्टिगोचर होते हैं.
पलाश के जंगल............और करौंदे की फ़ूली झाड़ियां .हवा में खट्टी मीठी गंध घुल रही है.कोमल कोमल हरी पत्तियों के बीच दंतुली खोल भोलेपन से मुस्काते छोटे छोटे फ़ूल.करौंदे की झाड़ी कैसी रससिक्त लगती है.अजीब लगेगा शायद कि भला झाड़ी का रस से क्या सम्बंध,पर है रस भी और शक्ति भी.साफ़ सुथरे बंगलो के कुशल हाथो से सवांरे गये लान में लगे डेहलिया,रजनीगंधा और चम्पा में रस है तो पर इतना महत्व पूर्ण कहां जितना पत्थरों की संगत में कांटों की छातीसे लिपट मुस्काते इन करौदों के नन्हे नहे फ़ूलो मे.मन कैसा खुशी से उमगता है प्रक्रिति की इन सौन्द्रावलियों के बीच.मन करता है दौड़ कर जायें उस थिरकती जल धारा केसंग ताल मिला ढेर सारी रुपहली झांझरो के नुपुर बजा अपना लाल हरा आंचल उड़ा इतना नाचें इतना नाचें कि आत्मसात कर ले यह प्रक्रिति हमें अपने भव्य व्यक्तित्व में.बस यूं हे घुल जाय हम इन अनाम फ़िजाओ में.
Thursday, August 13, 2009
Friday, March 27, 2009
भुलेश्वर मन्दिर भाग २
सीढीयों से ऊपर दाहिने हाथ पर दीवार पर भगवान की एक मुर्ति है.सामने के खम्बे पर गणेश जी विराजमान है.बेइन्तहा सुकून भरा हल्का अंधियारा था यहां .चमकती धूप से आने के बाद तो यहां पसरी शीतलता जैसे आहिस्ता आहिस्ता शिराओ मे घुलने लगती हैं.छत पत्थर की आयताकार सिल्लियों की बनी है पर उस जगह पर खुली जगह है जहां से छन कर आती रौशनी मन्दिर के सामने के हिस्से मे फ़ैले अंधेरे को उजाले की झीनी परत मे लपेट रही थी.बीचो बीच मन्दिर है.गर्भ ग्रिह तक पहुचने के लिये दो और कमरो से हो कर गुजरना पड़ता है.इस पूरे भाग मे धूप अगर की गंध घुल रही थी.एक दो पंडित जी लोग कलावा आदि ले कर बैठे थे.पर वे आपको घेरने की मुद्रा मे कतई नही दिख रहे थे.भीतर दूर पीले लाल फ़ूलो मे लिपटॆ शिवलिंग के ऊपर पीतल का शिव जी का चेहरा चमचमा रहा था.उस अनुभुति का वर्णन कर पानेमे मेरे शब्द सर्वथा असक्छम है.बिल्कुल बाहर से एक एक देहरी पार कर धीरे धीरे ईश्वर तक आना ऐसा था जैसे सच अपने चारो ओर लिपटे माया जाल को आहिस्ता आहिस्ता उतार फ़ैंकते हुए अपने मन की भीतरी पर्तो की ओर कदम कदम बढते जाना.अपने भीतर छिपे उस विराट के एक नन्हे से अंश से आमने सामने होने की यात्रा हो जैसे.
गर्भ ग्रिह जाने पर जो पहला कछ है उसमे पहले तीन ओर से दरवाजे थे .एक ओर का द्वार बंद कर दिया गया है पर एक सामने और एक बायी ओर खुलता द्वार अब है.इन द्वारो की बनावट तोरण के समान है.पुराने समय के लकड़ी के दरवाजो मे जो नक्काशी का काम देखने को मिलता है उतना ही बारीक काम यहां पत्थर पर है.सामने नन्दी का मंडप है ,जिसकी गोल चंदोवे वाली छत की नक्काशी बस देखते ही बनती है.हमने देखा कि यहां नन्दी का चेहरा ठीक शिव जी की ओर सीधे देखते हुए नही था वरन थोड़ा सा दाहिनी ओर को मुड़ी हुई द्र्ष्टी थी.पर हमने देखा कि नन्दी का चेहरा पीतल की पट्टियो और चेनों से ढका है.हमने अनुमान लगाया कि शायद नन्दी भी विध्वंश के शिकार हुये होगे और पुनः स्थापन के दौरन ऐसा हो गया होगा. इस मन्दिर मे हुई तोड़ फ़ोड़ को देख कर बहुत दुख होता है पर साथ ही उन शिल्पियो के प्रति मन श्रद्धा से अभिभुत हो जाता है.कितनी बेजोड़ थी उनकी कला की इतनी तहस नहस के बावजूद अपना सौन्दर्य संजो कर रखे हुए है.
मन्दिर की दीवारो पर रामायन ,महाभारत से सम्बन्धित चित्र उकेरे हुये है.बाणों की शैया पर भीष्म पितामह,महाभारत के युद्ध मे दोनो ओर से होती बाणो की वर्षा,रथ,अस्त्र-शस्त्र,राम भरत मिलाप का दृश्य,हाथी घोड़े उंट गरज यह कि हमारे अनेको पौराणिक संदर्भ छेनी हथौड़ी से लिखे हमारे सामने थे.शब्द कितने बेमानी हो उठते है ऐसे मे.मन्दिर के इस मुख्य हिस्से की बाहरी दीवारो की सरंचना सच अद्भुत.जैसे घड़ी के डायल मे घंटो के नम्बर के बीच मिनिट की छोटी रेखाये होती है कुछ इसी तरह गर्भ ग्रिह की बाहरी दीवारो पर पांच चौड़े खम्बो के बीच कै पतले पतले खम्बे और हर खम्बे पर नृत्य की मुद्रामे अभिसारिकाये .इतनी बारीक तरीके से उकेरी गयी है ये मुर्तिया कि उनका अप्रितिमशारीरिक सौष्ठव जैसे आंखो के सामने साकार होने लगता है .पर सारी मुर्तियां खंडित है.शायद ही किसी मुर्ति का चेहरा,हाथ और पैर साबुत हो लेकिन इसके बाव्जूद उनका आकर्षण अद्वितीय है.उनके आभूषण हमारे सम्रिद्ध अतीत की और न्रित्य की भंगिमाये कला की गवाह है.वैसे न्रित्य की मुद्रा मे नारी मुर्तियो को देख हमे याद आ गया कि हमारी मान्यता के अनुसार पार्वती जी ने भी इस स्थान पर न्रित्य किया था.शंकर के चारो ओर ये किसकी स्मृतिया है.
मन्दिर के मुख्य हिस्से के तीन ओर छाया दार गलियारे है.इन गलियारो और मन्दिर के बीच सकरी सी खुली जगह है जहां से आसमान दिखायी पड़ता है और सूरज की किरणे गर्भ गृह की बाहरी दीवारों पर पड़ती रहती है.क्या खम्भो पर पड़ती रौशनी से कभी दिन के चढने उतरने का अंदाजा लगाया जा सकता रहा होगा.ये गलियारे भीतर की ओर खम्बो पर टिके हैं और ये स्तंभ भी बहुत कलात्मक है.बीच बीच मे बाहरी दीवरो पर बाहर की ओर खुलते गवाच्छ है जिन्से ठंडी हवाये लगातर आती रहती है.
मन्दिर का उपरी हिस्सा सबसे अलग लगा हमे.यह बेसाल्ट पत्थर का नही वरन लाइम्स्टोन का बना हुआ है मन्दिर के भीतर ,गलियारो के बीच की खुली जगह से देखने मे जो हिस्सा दिखायी पड़ता है वह उपर को जाता नुकीला सा मन्दिर के विमान सा ही लगता है किंतु बाहर से इसका आकार बिल्कुल अलग सा लगता है.इस हिस्से मे भी अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है.
हमने यहां काफ़ी समय बिताया .सच पूछिये तो जी फ़िर भी भरा नही था .मन्दिर के बाहर कुछ दूरी पर बने दीप स्तम्भ,कुछ और इधर उधर बिखरी इक्का दुक्का इमारते,किले के ढहते बुर्ज सब किसी सम्रिद्ध अतीत के उजड़ते वर्तमान की गाथा कह रहे थे पर इस सबके बीच अंधियारे के बीच दिये की जगमगाती लौ सा दिपदिपा रहा था भोले बाबा का आवास ,विश्वास का सम्बल हमारे हाथ मे थमाता.
गर्भ ग्रिह जाने पर जो पहला कछ है उसमे पहले तीन ओर से दरवाजे थे .एक ओर का द्वार बंद कर दिया गया है पर एक सामने और एक बायी ओर खुलता द्वार अब है.इन द्वारो की बनावट तोरण के समान है.पुराने समय के लकड़ी के दरवाजो मे जो नक्काशी का काम देखने को मिलता है उतना ही बारीक काम यहां पत्थर पर है.सामने नन्दी का मंडप है ,जिसकी गोल चंदोवे वाली छत की नक्काशी बस देखते ही बनती है.हमने देखा कि यहां नन्दी का चेहरा ठीक शिव जी की ओर सीधे देखते हुए नही था वरन थोड़ा सा दाहिनी ओर को मुड़ी हुई द्र्ष्टी थी.पर हमने देखा कि नन्दी का चेहरा पीतल की पट्टियो और चेनों से ढका है.हमने अनुमान लगाया कि शायद नन्दी भी विध्वंश के शिकार हुये होगे और पुनः स्थापन के दौरन ऐसा हो गया होगा. इस मन्दिर मे हुई तोड़ फ़ोड़ को देख कर बहुत दुख होता है पर साथ ही उन शिल्पियो के प्रति मन श्रद्धा से अभिभुत हो जाता है.कितनी बेजोड़ थी उनकी कला की इतनी तहस नहस के बावजूद अपना सौन्दर्य संजो कर रखे हुए है.
मन्दिर की दीवारो पर रामायन ,महाभारत से सम्बन्धित चित्र उकेरे हुये है.बाणों की शैया पर भीष्म पितामह,महाभारत के युद्ध मे दोनो ओर से होती बाणो की वर्षा,रथ,अस्त्र-शस्त्र,राम भरत मिलाप का दृश्य,हाथी घोड़े उंट गरज यह कि हमारे अनेको पौराणिक संदर्भ छेनी हथौड़ी से लिखे हमारे सामने थे.शब्द कितने बेमानी हो उठते है ऐसे मे.मन्दिर के इस मुख्य हिस्से की बाहरी दीवारो की सरंचना सच अद्भुत.जैसे घड़ी के डायल मे घंटो के नम्बर के बीच मिनिट की छोटी रेखाये होती है कुछ इसी तरह गर्भ ग्रिह की बाहरी दीवारो पर पांच चौड़े खम्बो के बीच कै पतले पतले खम्बे और हर खम्बे पर नृत्य की मुद्रामे अभिसारिकाये .इतनी बारीक तरीके से उकेरी गयी है ये मुर्तिया कि उनका अप्रितिमशारीरिक सौष्ठव जैसे आंखो के सामने साकार होने लगता है .पर सारी मुर्तियां खंडित है.शायद ही किसी मुर्ति का चेहरा,हाथ और पैर साबुत हो लेकिन इसके बाव्जूद उनका आकर्षण अद्वितीय है.उनके आभूषण हमारे सम्रिद्ध अतीत की और न्रित्य की भंगिमाये कला की गवाह है.वैसे न्रित्य की मुद्रा मे नारी मुर्तियो को देख हमे याद आ गया कि हमारी मान्यता के अनुसार पार्वती जी ने भी इस स्थान पर न्रित्य किया था.शंकर के चारो ओर ये किसकी स्मृतिया है.
मन्दिर के मुख्य हिस्से के तीन ओर छाया दार गलियारे है.इन गलियारो और मन्दिर के बीच सकरी सी खुली जगह है जहां से आसमान दिखायी पड़ता है और सूरज की किरणे गर्भ गृह की बाहरी दीवारों पर पड़ती रहती है.क्या खम्भो पर पड़ती रौशनी से कभी दिन के चढने उतरने का अंदाजा लगाया जा सकता रहा होगा.ये गलियारे भीतर की ओर खम्बो पर टिके हैं और ये स्तंभ भी बहुत कलात्मक है.बीच बीच मे बाहरी दीवरो पर बाहर की ओर खुलते गवाच्छ है जिन्से ठंडी हवाये लगातर आती रहती है.
मन्दिर का उपरी हिस्सा सबसे अलग लगा हमे.यह बेसाल्ट पत्थर का नही वरन लाइम्स्टोन का बना हुआ है मन्दिर के भीतर ,गलियारो के बीच की खुली जगह से देखने मे जो हिस्सा दिखायी पड़ता है वह उपर को जाता नुकीला सा मन्दिर के विमान सा ही लगता है किंतु बाहर से इसका आकार बिल्कुल अलग सा लगता है.इस हिस्से मे भी अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है.
हमने यहां काफ़ी समय बिताया .सच पूछिये तो जी फ़िर भी भरा नही था .मन्दिर के बाहर कुछ दूरी पर बने दीप स्तम्भ,कुछ और इधर उधर बिखरी इक्का दुक्का इमारते,किले के ढहते बुर्ज सब किसी सम्रिद्ध अतीत के उजड़ते वर्तमान की गाथा कह रहे थे पर इस सबके बीच अंधियारे के बीच दिये की जगमगाती लौ सा दिपदिपा रहा था भोले बाबा का आवास ,विश्वास का सम्बल हमारे हाथ मे थमाता.
भुलेश्वर मन्दिर..दीवारो पर रचे छंद..भाग १
पिछले रविवार यनि २२ मार्च हन भुलेश्वर मन्दिर गये.थोड़ा बहुत सुना था इस मन्दिर के विषय में कुछ तस्वीरे भी देखी थी पर जो अभूतपूर्व अनुभव हुआ उसकी तो हमने कल्पना भी नहीं की थी. अचानक ही जाना तय हो गया.रात सुंदर के पास श्रीजित का फोन आया और सबेरे उसकी गाड़ी से हम लोग निकल पड़े.पुणे से तकरीबन ५५कि.मी. की दूरी पर है यह तेरहवीं शताब्दी का मन्दिर.शोलापुर हाइवे पर शहर के बाहर निकलने पर लोग रास्ता बता देते हैं.हां ,बस आदि का कोई साधन हमे नहीं दिखा मन्दिर के आस पास.अधिकतर लोग कार,टैक्सी या बाइक पर ही आ रहे थे.
तो शहर का छॊर खत्म होते ही सड़क के दोनो ओर फ़ूल पौधो की नर्सरी और फ़िर अंगूरो के बाग शुरु हो जाते है.दूर घेरा बांध खड़ी पहड़ियो के बीच एक पहाड़ी पर मन्दिर का आकार हाइवे से ही दिखने लगता है.धुंध मे लिपटा .आगे जा कर दाहिने मुड़ कर सड़क छुट्पुट बिखरे गांव के बीच से हो कर गुजरती है और फ़िर शुरु हो जाता है पहाड़ियो पर चढाई का सिल सिला.बारिश का मौसम होता तो सारी पहाड़ियां हरियाली से लदी होती.घाटियों से ले कर चोटियो तक बादल भाग दौड़ कर रहे होते और हो सकता है कई झरने भी उछल कूद करते दिख जाते .यकीनन प्रक्रिति का यह श्यामल रूप मंत्रमुग्घ करने वाला होता पर इस समय यानि गर्म मौसम मे मन्दिर तक पहुंचने का अपना एक अलग सुख है जिसकी चर्चा हम बाद मे करेगे .अभीतो हम रास्ते पर ही हैं.इस समय ऊपर चटक नीला आसमान था और नीचे पहाड़ियों पर भूरा सुनहला रंग बिखरा था. सुखी हुई वनस्पति का रंग पकी हुई गेंहू की बाली सा था और बीच बीच मे बड़े पेड़ जो अपनी हरीतिमा को बरकरार रखे थे.पर अपनी इस सफ़लता पर ना झूम रहे थे ना इठला वरन स्थितप्रग्य धीर मनस्वियों से खड़े थे,शांत ,धीर गम्भीर जैसे कह रहे हो देखो जितनी गहराई से अपनी माटी से जुड़े रहोगे मन का रस उतना ही बचा रहेगा.रास्ते के घुमावों चढाई उतार के बीच मन्दिर की झलक मिलती रहती है.
भुलेश्वर मन्दिर के चारो ओर कभी एक किला था.अब यह तो हमे ठीक ठीक नही मालूम की मन्दिर पहले बना कि किला पर हां मन्दिर समय की मार और मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवर्तियों का शिकार होने के बावजूद आज भी अपनी समूची गरिमा के साथ स्थापित है पर किले के अवषेशों के नाम पर केवल दो ढहते हुए बुर्ज ही बचे हैं.कुछ जानकारों के अनुसार किला सोलहवी शताब्दी मे बनवायागया था.यानि मन्दिर के बाद मे.सच ही तो है नश्वर तो मानव होता है इश्वरीय सत्ता तो अजर अमर है.इस किले को दौलत मंगल गढ या मंगलगढ के नाम से जाना जाता है.
मन्दिर को तेरहवीं शताब्दी मे चौला वंश के राजाओ ने बनवाया था.मन्दिर के विषय मे पौराणिक मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां देवी पार्वती ने भगवान शंकर के समुख न्रित्य किया था और यहीं से दोनो ने सीधे कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर विवाह सम्पन्न किया था.मन्दिर स्थापत्य कला एवं पत्थरों पर करीगरी का एक अनुपम खजाना है.मन्दिर का निर्माण हेमादिपथ स्थापत्य कला के अनुसार हुआ है.कहते है कि चौला राजवंश के एक प्रतिभा शाली मंत्री ने इस पद्धति की शुरुआत की थी.महाराष्ट्र मे इस स्थापत्य पद्धति के अंतर्गत निर्मित कई प्रसिद्ध मन्दिर है.आस पास पाये जाने वाले काले रंग के बेसाल्ट पत्थर और लाइम स्टोन से निरमित है यह मन्दिर.
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोमुखी तरीके से यानि कि छिपा हुआ बना है.कुछ लोगो का मानना है कि तेरहवीं शताब्दी मे इस प्रकार के प्रवेश्द्वार नही बनते थे .शायद विध्वंश के दौरान पहले वाला द्वार नष्ट हो गया होगा और बाद मे शिवा जी के काल मे इसका पुनः निर्माण हुआ होगा.
आज मन्दिर एक उंची पहाडी पर है.मन्दिर तक गाड़िया आसानी से पहुंच जाती हैं .कोई सात आठ सीढीया चढ कर एक लम्बे चौड़े खुले चबूतरे पर पंहुचते है.भरी दोपहर मे भी यहां हवाये ठंडी और सुखद थी.मन्दिर के प्रवेश द्वार के सम्मुख लोहे के गर्डिल पर एक विशाल घंटा लगा है.मन्दिर मे घुसते ही एक सपाट बड़ा कमरा है जिसके पीछे वाली दीवार पर एक सकरा दरवाजा है.इस छोटे से द्वार मे घुसते ही दाहीनी ओर सकरी थोड़ी अनगढ सी सीढीया उपर जाती है और यहीं से शुरु हो जाता है नीम अंधेरे,रौशनी,आत्मा तक पहुचने वाली ठंडक और मुखर पाषाणो के बीच आपका सफ़र.
तो शहर का छॊर खत्म होते ही सड़क के दोनो ओर फ़ूल पौधो की नर्सरी और फ़िर अंगूरो के बाग शुरु हो जाते है.दूर घेरा बांध खड़ी पहड़ियो के बीच एक पहाड़ी पर मन्दिर का आकार हाइवे से ही दिखने लगता है.धुंध मे लिपटा .आगे जा कर दाहिने मुड़ कर सड़क छुट्पुट बिखरे गांव के बीच से हो कर गुजरती है और फ़िर शुरु हो जाता है पहाड़ियो पर चढाई का सिल सिला.बारिश का मौसम होता तो सारी पहाड़ियां हरियाली से लदी होती.घाटियों से ले कर चोटियो तक बादल भाग दौड़ कर रहे होते और हो सकता है कई झरने भी उछल कूद करते दिख जाते .यकीनन प्रक्रिति का यह श्यामल रूप मंत्रमुग्घ करने वाला होता पर इस समय यानि गर्म मौसम मे मन्दिर तक पहुंचने का अपना एक अलग सुख है जिसकी चर्चा हम बाद मे करेगे .अभीतो हम रास्ते पर ही हैं.इस समय ऊपर चटक नीला आसमान था और नीचे पहाड़ियों पर भूरा सुनहला रंग बिखरा था. सुखी हुई वनस्पति का रंग पकी हुई गेंहू की बाली सा था और बीच बीच मे बड़े पेड़ जो अपनी हरीतिमा को बरकरार रखे थे.पर अपनी इस सफ़लता पर ना झूम रहे थे ना इठला वरन स्थितप्रग्य धीर मनस्वियों से खड़े थे,शांत ,धीर गम्भीर जैसे कह रहे हो देखो जितनी गहराई से अपनी माटी से जुड़े रहोगे मन का रस उतना ही बचा रहेगा.रास्ते के घुमावों चढाई उतार के बीच मन्दिर की झलक मिलती रहती है.
भुलेश्वर मन्दिर के चारो ओर कभी एक किला था.अब यह तो हमे ठीक ठीक नही मालूम की मन्दिर पहले बना कि किला पर हां मन्दिर समय की मार और मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवर्तियों का शिकार होने के बावजूद आज भी अपनी समूची गरिमा के साथ स्थापित है पर किले के अवषेशों के नाम पर केवल दो ढहते हुए बुर्ज ही बचे हैं.कुछ जानकारों के अनुसार किला सोलहवी शताब्दी मे बनवायागया था.यानि मन्दिर के बाद मे.सच ही तो है नश्वर तो मानव होता है इश्वरीय सत्ता तो अजर अमर है.इस किले को दौलत मंगल गढ या मंगलगढ के नाम से जाना जाता है.
मन्दिर को तेरहवीं शताब्दी मे चौला वंश के राजाओ ने बनवाया था.मन्दिर के विषय मे पौराणिक मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां देवी पार्वती ने भगवान शंकर के समुख न्रित्य किया था और यहीं से दोनो ने सीधे कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर विवाह सम्पन्न किया था.मन्दिर स्थापत्य कला एवं पत्थरों पर करीगरी का एक अनुपम खजाना है.मन्दिर का निर्माण हेमादिपथ स्थापत्य कला के अनुसार हुआ है.कहते है कि चौला राजवंश के एक प्रतिभा शाली मंत्री ने इस पद्धति की शुरुआत की थी.महाराष्ट्र मे इस स्थापत्य पद्धति के अंतर्गत निर्मित कई प्रसिद्ध मन्दिर है.आस पास पाये जाने वाले काले रंग के बेसाल्ट पत्थर और लाइम स्टोन से निरमित है यह मन्दिर.
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोमुखी तरीके से यानि कि छिपा हुआ बना है.कुछ लोगो का मानना है कि तेरहवीं शताब्दी मे इस प्रकार के प्रवेश्द्वार नही बनते थे .शायद विध्वंश के दौरान पहले वाला द्वार नष्ट हो गया होगा और बाद मे शिवा जी के काल मे इसका पुनः निर्माण हुआ होगा.
आज मन्दिर एक उंची पहाडी पर है.मन्दिर तक गाड़िया आसानी से पहुंच जाती हैं .कोई सात आठ सीढीया चढ कर एक लम्बे चौड़े खुले चबूतरे पर पंहुचते है.भरी दोपहर मे भी यहां हवाये ठंडी और सुखद थी.मन्दिर के प्रवेश द्वार के सम्मुख लोहे के गर्डिल पर एक विशाल घंटा लगा है.मन्दिर मे घुसते ही एक सपाट बड़ा कमरा है जिसके पीछे वाली दीवार पर एक सकरा दरवाजा है.इस छोटे से द्वार मे घुसते ही दाहीनी ओर सकरी थोड़ी अनगढ सी सीढीया उपर जाती है और यहीं से शुरु हो जाता है नीम अंधेरे,रौशनी,आत्मा तक पहुचने वाली ठंडक और मुखर पाषाणो के बीच आपका सफ़र.
Saturday, December 27, 2008
२३ नवम्बर भी और रविवारो की ही तरह शुरु हुआ.एक साधारण सा दिन.छोटू को सबेरे सबेरे बी.टी के एक्जाम्स के लिये निकलना था तो उसे नाश्ता करा कर और दे कर सात बजे तक विदा कर दिया था.पर पता नहीं क्यों यूं ही घर मे पेपर, किताब पढते हुए ,नेट करते हुए ,खाना बनाना और कपड़े धोने के बीच कई बार चाय पीते हुये दिन बिताने का मन नहीं कर रहा था.पर यह भी सच था कि काम खत्म भी करने थे और कहीं बहुत दूर निकल जाना ,वह भी बिना किसी प्लानिंग के सम्भव नहीं लग रहा था.हमे अचानक याद आया कि एक दिन सुदंर ने बताया थाकि उन्होने ने बाणेर में पहाड़ी पर एक मन्दिर देखा था.निर्माण की अवस्था मे था शायद वह.हमने सोचा चलो वहीं तक हो आते हैं.सच तो यह कि वाहन का ना होना सबसे बड़ी रुकावट बन जाता है कहीं भी बाहर निकलने में .खैर हम लोग तकरीबन साढे दस बजे तक काम निपटा कर घर से निकल ही पड़े.
हमें मन्दिर का ठीक ठीक पता नही था,पर निकल पड़े थे तो मिल तो जायेगा ही.फ़ूड बाज़ार तक का आटो किया और फ़िर सीधे पैदल चलना शुरु किया.यह अच्छा है कि हम लोग जब बाहर यूं ही घूमने निकलते है तो बहुत सुविधाये हमे नहीं चाहिये होती हैं. मौसम भी हमे परेशान नहीं करता ,चाहे उसका मिज़ाज कैसा भी हो.ठीक है शारीरिक थकावट वगैरह तो होना स्वाभाविक है पर हम मन से मस्त रहते है और ऐसा हम दोनो के ही साथ नही है, वरन बच्चे भी घूमना ऐसे इन्ज्वाय करते है.हां तो कुछ दूर ही पैदल चलने के बाद पहाड़ी पर मन्दिर दिखना तो शुरु हो गया पर उस तक पहुंचने का रास्ता नज़र नहीं आ रहा था.पूछते पाछ्ते हम बाणेर गांव की उस गली तक पहुंच ही गये जहां दो घरो के बीच की जगह से ऊपर को जाती सीढीयां दिखायी दी.हमारी उत्तरां चल की यादें ताज़ा हो गयीं वहां भी एक दूसरे से पीठ टिकाये ऐसे ही छोटे छोटे घरो के बीच से सकरा सा रास्ता फ़ूटता था और कभी ऊपर पहाड़ो को और कभी नीचे गुफ़ाओ को जाती सीढीया किसी मन्दिर तक ले जाती थी.
सीढीया चढते हुये हम कल्पना करते जा रहे थे कि बारिश के मौसम मे यह जगह कितनी खूबसूरत लगती होगी.पहाड़ी हरियाली से भरी हो तो हवा में ताजगी अपने आप ही घुल जाती है.खैर इस समय भी कुछ बड़े ,कुछ छोटे पेड़ पहाड़ी पर फ़ैलते भूरेपन की एकरसता तोड़्ने का भरसक प्रयास कर रहे थे और कामयाब भी हो रहे थे.चढाई की शुरुआत में ही एक गुफ़ा में भी मन्दिर है शिव जी का -बाणेश्वर महादेव.पर हम लोग पहले ऊपर वाले मन्दिर गये.शायद पहले कोई पुराना छोटा मन्दिर या मठिया रही होगी जिसका जीर्णोद्धार हो रहा है.अभी मन्दिर बन रहा है.साफ़सफ़ाई करने वाले तो है पर कोई पुजारी जी वगैरह दिखलाई नही पड़े .हो सकता है कि त्योहारों और पूजा पाठ वाले मौसम मे ही अभी रहते हो.यह मन्दिर तुकाई माता के मन्दिर के नाम से जाना जाता है.इन देवी के अवतार के विषय मे कोई बताने वाला तो वहां था भी नहीं और अंडाकार चिकने पत्थरो मे सत्यनारायण के दर्शन कर लेने वाले हमारे मन को कहाँ फ़र्क पड़ता है कि देवी का नाम क्या है और वे कहां से अवतरित हुईं.
मन्दिर में बेइंतहा शान्ति थी.खिड़्कियों से अंदर आती सूर्य की किरणॆ धूप छांव का एक करिश्माई संसार रच रही थी चारो ओर से आती ठंडी हवा बहुत सुकुन दे रही थी.सड़क की ओर खुलते मंदिर के छज्जे से नीचे दूर दूर तक फ़ैला शहर दिख रहा था.जो इमारते नीचे से आकाश को छूती लगती है वही इस ऊंचायी से माचिस की डिबिया सी लग रही थी.नहीं मन्दिर बहुत ऊंचाई पर नहीं है पर शायद यह भौतिकता से आध्यात्मिक निर्मलता की दूरी हो.बस कुछ कदम और मन किसी दूसरे लोक मे ही होता है.
मन्दिर के पीछे की ओर दूर तक बची खुची पहाड़ियो का सिलसिला है.दूर एक और छोटा मन्दिर भी दिखायी पड़ता है.उस मन्दिर से इस मन्दिर तक आने जाने का रास्ता भी है.कुछ लोग आ जा भी रहे थे पर हम लोग नहीं गये.पहाड़ियो के पहले कुछ और बनती इमारतो के ढांचे,अपनी अपनी सरहदें और इन सब के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते इक्का दुक्का खेत.थे एक ही दो पर सच पूछिये तो चारो ओर फ़ैले सीमेंट,कंक्रीट पर भारी पड़ रही थी,आंखे जुड़ाती उनकी हरियाली.हम कितने भी झंडे गाड़ ले अपनी प्रगति के पर प्रक्रिति का इक नन्हा सा भी कतरा हमे जता देता है कि सर्वोपरि तो वही है जो सहज है स्वाभाविक है.
नीचे आ कर हम गुफ़ा में शंकर भगवान के मन्दिर में गये.पुरानी सदी की कुछ मुर्तियां,कुछ खंडित ,कुछ साबुत एक किनारे रखी हुई थी.भीतर छोटी सी जगह में शिवलिंग स्थापित है.नीम अंधेरी गुफ़ा में कोने में दिया जल रहा था.उस प्रकाश में सब कुछ भुला अंतस में भक्ति की अलख जगाने की शक्ति थी.हम लोग बहुत देर तक वहां बस चुपचाप बैठे रहे.सुंदर ने उस स्थान को चित्रो में सहेजा और फ़िर हम वापस आ गये.वहीं चौड़ी सड़क पर भागते वाहन,ऊंची इमारते,बड़ी दुकाने.लेकिन सब कुछ नया सा लग रहा था.ऐसा ही होता है.रोज एक ढर्रे से चलती जिन्दगी के बीच हम जब कुछ समय थोड़ा अलग ढंग से गुजार लेते है तो ताजादम हो एक बार फ़िर जद्दोजहद के लिये तैयार हो
जाते है.कुछ मुश्किल भी नही होता ऐसा कर पाना बस अक्सर हमी अपने आपको तैयार नहीं कर पाते.कहीं बाहर निकलना भी शायद इतना जरूरी नहीं होता .हां कुछ समय अपने साथ गुजारना बहुत जरूरी है.

मन्दिर के भीतर
हमें मन्दिर का ठीक ठीक पता नही था,पर निकल पड़े थे तो मिल तो जायेगा ही.फ़ूड बाज़ार तक का आटो किया और फ़िर सीधे पैदल चलना शुरु किया.यह अच्छा है कि हम लोग जब बाहर यूं ही घूमने निकलते है तो बहुत सुविधाये हमे नहीं चाहिये होती हैं. मौसम भी हमे परेशान नहीं करता ,चाहे उसका मिज़ाज कैसा भी हो.ठीक है शारीरिक थकावट वगैरह तो होना स्वाभाविक है पर हम मन से मस्त रहते है और ऐसा हम दोनो के ही साथ नही है, वरन बच्चे भी घूमना ऐसे इन्ज्वाय करते है.हां तो कुछ दूर ही पैदल चलने के बाद पहाड़ी पर मन्दिर दिखना तो शुरु हो गया पर उस तक पहुंचने का रास्ता नज़र नहीं आ रहा था.पूछते पाछ्ते हम बाणेर गांव की उस गली तक पहुंच ही गये जहां दो घरो के बीच की जगह से ऊपर को जाती सीढीयां दिखायी दी.हमारी उत्तरां चल की यादें ताज़ा हो गयीं वहां भी एक दूसरे से पीठ टिकाये ऐसे ही छोटे छोटे घरो के बीच से सकरा सा रास्ता फ़ूटता था और कभी ऊपर पहाड़ो को और कभी नीचे गुफ़ाओ को जाती सीढीया किसी मन्दिर तक ले जाती थी.
सीढीया चढते हुये हम कल्पना करते जा रहे थे कि बारिश के मौसम मे यह जगह कितनी खूबसूरत लगती होगी.पहाड़ी हरियाली से भरी हो तो हवा में ताजगी अपने आप ही घुल जाती है.खैर इस समय भी कुछ बड़े ,कुछ छोटे पेड़ पहाड़ी पर फ़ैलते भूरेपन की एकरसता तोड़्ने का भरसक प्रयास कर रहे थे और कामयाब भी हो रहे थे.चढाई की शुरुआत में ही एक गुफ़ा में भी मन्दिर है शिव जी का -बाणेश्वर महादेव.पर हम लोग पहले ऊपर वाले मन्दिर गये.शायद पहले कोई पुराना छोटा मन्दिर या मठिया रही होगी जिसका जीर्णोद्धार हो रहा है.अभी मन्दिर बन रहा है.साफ़सफ़ाई करने वाले तो है पर कोई पुजारी जी वगैरह दिखलाई नही पड़े .हो सकता है कि त्योहारों और पूजा पाठ वाले मौसम मे ही अभी रहते हो.यह मन्दिर तुकाई माता के मन्दिर के नाम से जाना जाता है.इन देवी के अवतार के विषय मे कोई बताने वाला तो वहां था भी नहीं और अंडाकार चिकने पत्थरो मे सत्यनारायण के दर्शन कर लेने वाले हमारे मन को कहाँ फ़र्क पड़ता है कि देवी का नाम क्या है और वे कहां से अवतरित हुईं.
मन्दिर में बेइंतहा शान्ति थी.खिड़्कियों से अंदर आती सूर्य की किरणॆ धूप छांव का एक करिश्माई संसार रच रही थी चारो ओर से आती ठंडी हवा बहुत सुकुन दे रही थी.सड़क की ओर खुलते मंदिर के छज्जे से नीचे दूर दूर तक फ़ैला शहर दिख रहा था.जो इमारते नीचे से आकाश को छूती लगती है वही इस ऊंचायी से माचिस की डिबिया सी लग रही थी.नहीं मन्दिर बहुत ऊंचाई पर नहीं है पर शायद यह भौतिकता से आध्यात्मिक निर्मलता की दूरी हो.बस कुछ कदम और मन किसी दूसरे लोक मे ही होता है.
मन्दिर के पीछे की ओर दूर तक बची खुची पहाड़ियो का सिलसिला है.दूर एक और छोटा मन्दिर भी दिखायी पड़ता है.उस मन्दिर से इस मन्दिर तक आने जाने का रास्ता भी है.कुछ लोग आ जा भी रहे थे पर हम लोग नहीं गये.पहाड़ियो के पहले कुछ और बनती इमारतो के ढांचे,अपनी अपनी सरहदें और इन सब के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते इक्का दुक्का खेत.थे एक ही दो पर सच पूछिये तो चारो ओर फ़ैले सीमेंट,कंक्रीट पर भारी पड़ रही थी,आंखे जुड़ाती उनकी हरियाली.हम कितने भी झंडे गाड़ ले अपनी प्रगति के पर प्रक्रिति का इक नन्हा सा भी कतरा हमे जता देता है कि सर्वोपरि तो वही है जो सहज है स्वाभाविक है.
नीचे आ कर हम गुफ़ा में शंकर भगवान के मन्दिर में गये.पुरानी सदी की कुछ मुर्तियां,कुछ खंडित ,कुछ साबुत एक किनारे रखी हुई थी.भीतर छोटी सी जगह में शिवलिंग स्थापित है.नीम अंधेरी गुफ़ा में कोने में दिया जल रहा था.उस प्रकाश में सब कुछ भुला अंतस में भक्ति की अलख जगाने की शक्ति थी.हम लोग बहुत देर तक वहां बस चुपचाप बैठे रहे.सुंदर ने उस स्थान को चित्रो में सहेजा और फ़िर हम वापस आ गये.वहीं चौड़ी सड़क पर भागते वाहन,ऊंची इमारते,बड़ी दुकाने.लेकिन सब कुछ नया सा लग रहा था.ऐसा ही होता है.रोज एक ढर्रे से चलती जिन्दगी के बीच हम जब कुछ समय थोड़ा अलग ढंग से गुजार लेते है तो ताजादम हो एक बार फ़िर जद्दोजहद के लिये तैयार हो
जाते है.कुछ मुश्किल भी नही होता ऐसा कर पाना बस अक्सर हमी अपने आपको तैयार नहीं कर पाते.कहीं बाहर निकलना भी शायद इतना जरूरी नहीं होता .हां कुछ समय अपने साथ गुजारना बहुत जरूरी है.
मन्दिर के भीतर
Wednesday, October 15, 2008
मानसून आने के बाद से हर हफ़्ते मुम्बई से पुणे आने पर सुन्दर रास्ते के खूबसूरत द्रिश्यों के वर्णन से भरे रहते थे.और इस सप्ताह जब लगातार तीन छुट्टियां पड़ी तो सुन्दर ने कहा चलो तुम्हे भी उन द्रिश्यों से मिलवा लाये.पता है ना सुनदर को कि हमे पर्क्रिति सन्ग बिताये गये पल कितने प्यारे है .तो पिछले रविवार यानि१७ तारीख को सबेरे हम लोग चल दिये मलवली की ओर.घर में ही साढे सात बज गये थे सुंदर ने कहा अब आठ वाली लोकल तो लगता है मिलेगी नहीं.क्या एक घंटे बाद निकला जाय.हम तो बस निकलने के उतसाह से भरे थे तो बोले नहीं अब तैयार है तो अभी निकलेगे .लोकल छूट गयी तो वहीं प्लेटफ़ार्म पर घूमेगे,बारिश मे भीगती पटरिया देखेगे और चाय पीते हुए अगली लोकल का इन्त्ज़ार करेगे.तो जूते कस कर हम निकल पडे .और देखिये इधर हम लोग शिवाजी नगर पहुंचे और उधर आठ की लोकल के आने की सनसनी फ़ैली.तो गरज यह कि भागते दौड़ते हम लोग हो गये ट्रेन पर सवार.हमे लगा कि यह अच्छा शगुन हुआ है और दिन उत्साह भरा,उमगा उमगा ही बीतना चाहिये.घंटे भर मे हम मलवली पहुंच गये.
छोटा सा स्टेशन जो साल के बाकी महीने तो ऊंघता रहता है पर बारिश के आते ही अंगडाई ले उठ बैठता है.सोता रह भी कैसे सकता है.उमगते,उछलते,संभल संभल चलते अनिगिनित कदमोकी आहटे रोज़ दस्तक देती है यहां मानसून मे.उस दिन भी बहुत सारे ग्रुप उतरे लोकल से .बाहर आते ही ,सामने हरियाली से लदे पहाड़ो से आती हवाओं ने भाग कर आ कर स्वागत किया .सामने ही तीन चार टीन टप्पर वाली दुकाने थी ,चाय नाश्ते की.चाय पी कर हम पैदल ही आगे बढ लिये.
आगे पीछे और भी लोग चल रहे थे.पुल पर से एक्स्प्रेस हाइवे दिखाई पड रहा था.नीचे भागती हुई कारे जैसे किसि और ही दुनिया मे थी.हल्कि फ़ुल्कि बूंदा बांदी हो रही थी .सब ताजगी से भरा.सामने अब आ गया था झरना .यह झरना जैसे मलवली के प्रवेशद्वार पर है.बगल से रास्ता चला जाता है लोह्गढ को और सामने बनी सीढीयां भाजा गुफ़ाओ की ओर.पर पहले झरने की बात.बहुत ऊंचाई से गिरता आता ,यह जलप्रपात काफ़ी बड़ा है पर बहुत शांत.गोदी मे के बच्चो से ले कर बुजुर्गवार तक सब इसके आगोश मे नश्चिन्त हो प्राकृर्तिक सुख का आनन्द उठा सकते है.चौड़ी चौड़ी चट्टानो से हो कर बहती इसकी जलधाराए सुकून का एह्सास दिलाती हैं .
हम लोग इस झरने पर अधिक देर ना रुक कर भाजा की सीढीयो की ओर बढ़ लिये.जैसा कि अधिक्तर बौध गुफ़ाओ मे होता है यहां भी बीच मे चैत्य सभाग्रह है. यह कार्ला के चैत्य सभाग्रिह से कम भव्य होते हुए भी काफ़ी आकर्षक है.सच तोयह है कि सदियो के पन्ने पलट जब भी किसी ऐसी चौखट पर जा खड़े हो तो मन जैसे किसि और ही तरह का हो जाता है और फ़िर इतिहास की निःश्ब्द ध्वनियाँ स्वयमेव ही उंगली पकड़ ले चलती है बीते वक्त के गलियारों मे.गुफ़ाओं के बाहर खुली जगह है जहां से सामने की घाटी और घाटी के उस पार के पहाड़ ,इस दिशा से उस दिशा तक खिचे दिखायी पड़ते है.जितनी देर सुन्दर ने सभाग्रिह के खम्भों,स्तूप,गोलाकार छत और नक्काशीदार स्तम्भो को कैमरे मे कैद किया उतनीदेर हमने गुफ़ा के पास बनी ऊपर को जाती सीढीयो पर बैठ चारो ओर की हरियाली को छ्क कर पिया.
फ़िर हम उसी दिशा मे आगे बढे.कुछ ही दूरी पर सकरे रास्ते पर पांच स्तूप बने थे एक कतार मे जैसे.क्यों बनाये गये होगे ये स्तूप यहां खुले मे.वैसे हमे पढना भी चाहिये कि क्यों बनाये जाते थे स्तूप.हां तो बारिश मे भीगते इस स्तूपो को देख मेरे मन मे एक अजीब सा दुख भरा भाव पैदा हुआ.जैसे किसी सुनसान से रास्ते पर अकेले जाते हुए बच्चे को देख कर होता है ना वैसे ही.थोड़ा और आगे चलने पर एक बहुत ही खूबसूरत अनुभव हमारा इंतजार कर रहा था .एक छोटी सी गुफ़ा की दीवारो पर बहुत सुंदर चित्र उकेरे गये थे.ऐसा लग रहा था किसी पुराने शिल्प्कार का स्टूडियो हो जैसे.यूं भी चट्टानो पर उकेरे गये चित्रो मे एक अद्भुत संगीत बसता है.जैसे जैसे बारीक रेखायो पर नज़र ठिठक ठिठक आगे बढती है सदियो पहले की वह छॆनी हथौड़ी की आवाज पत्थरो से झरने लगती है.सात घोड़ो के रथ पर सवार सूर्य,समूचे लावा लश्कर के साथ एरावत पर सवार इंद्र की सवारी,मनोहारी केश विन्यास ,छलकते भाव,धनुष बाण,नक्काशीदार खम्बे.............कौन होगा भला वह जिसने इस एकांत को अपनी साधना स्थली बनाया होगा.
इस गुफ़ा से सट कर शुरु होती है एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी पर्वत श्रंखलाये.ऊपर से नीचे तक हरियाली से लदी,चारो ओर जहां तक नज़र जाये.एक झरना वेग से हरहराता नीचे को भागा चला जा रहा था.हम काफ़ी उचायी पर थे ,पर जलप्रपात का उदगम कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था और नीचे को भागी जाती जलधारा भी कुछ दूरी के बाद हरियाली के बीच कहीं गुम हो गयी थी.यह झरना गुफ़ा के इतने पास था कि पानी के उड़ते छीटॆ हमे भिगो रहे थे.तन मन दोनोभीगे.इसी गुफ़ा के पास मिली थी हमे चार नन्दो और एक भाभी की वह टॊली.पांच पांडव जैसी.सब लगभग एक साइज़ की.उनकी फ़ोटो खीची हम लोगो ने गुफ़ा के खम्बोके बीच खड़े.ऐसा लग रहा था गिन कर खम्बे उन्ही लोगो के लिये बनाये गये हो जैसे.
उस गुफ़ा के बाद वापस लौटना होता है .कुछ लोग जीना उतर कर नीचे तक जाते है और फ़िर लौहगढ जाने के लिये बनी हुई सड़क से वापस ऊपर चढते है और कुछ लोग खास कर लडको के ग्रुप्स वगैरह चैत्य हाल के सामने से ढलान पर नीचे उतर जाते है और फ़िर झाड़ियो ,पेड़ो के बीच से ,चट्टानो पर चढते उतरते,तेजी से बहती पानी की धाराओ को पार करते हुए काफ़ी आगे जा कर लौह्गढ जाने के रास्ते पर जा मिलते है.हमने भी यही रास्ता चुना.हांहां हमे मालूम है कि ऐसे एड्वेन्चर करने की हम लोगो की उम्र नही रह गयी पर भला प्रक्रिति के आंचल मे जा कर भी खुद को भूल ना पाये तो भला क्या खाक आनन्द उठाया .और फ़िर मेरा मानना है कि अगर स्वयम को प्रक्रितिक शक्तियो के हवाले कर दो तो वे आपकी रक्छाखुद ही करती है.मुश्किल तो तब होती है जब आदमी उन अद्रिश्य प्राक्रितिक शक्तियो को नीचा दिखाने की ,उन पर अंकुश लगाने की कोशिश करता है.जब भी हमे अपनी ही ताकत पर कुछ ज्यादा ही गुमान होने लगता है ,वह सत्ता हमे कोई न कोई झटका दे समझाने की कोशिश करती है,संभलने का मौका देती है पर हम है कि बाज ही नही आते.
हां ,तो हम लोग मन मे विश्वास रख चल पडे.थोड़ी देर बाद लोग नज़र आने बंद हो गये.पैरो के नीचे भीगी हरी घास ,फिसलन भरी चट्टाने,अलग अलग तरह की वनस्पतियाँ,कहीं बीच बीच मे कच्ची सी पगडंडी जो थोड़ी दूर जा कर ना जाने कहां खो जाती थी.कभी कभी दूर से आती लोगो की आवाजे सुनायी देती पर लोग दिखायी नही देते.एक अद्रिश्य साथ,एक अनबोले सहारे की अनुभुति.पीछे मुड़ कर देखने पर दूर पहाड थे .चारो ओर से हरियाली का उमड़ता आता समुन्दर.आंखे बंद करो तो लहरो के झूले मे आहिस्ता आहिस्ता झूलने का एह्सास होने लगे.
हम लोग कुछ और आगे बढे तो ऊपर से बह कर आती पानी की धारा मिली.यह धारा बहुत तेज भी नही थी और बहुत गहरी भी नही.हां आस पास की चट्टाने खासी फिसलन भरी थी और धारा पार करने के लिये पानी से भीगी चट्टानो पर पैर रख कर पार जाना था.यहां हमे कुछ लड़के मिले.ये दूसरे रास्ते से आये थे और उछल कूद के चक्कर मे इनमे से एक आध फ़िसल कर गिर चुके थे और जोर से लगी चोटो से थोड़े घबडाये हुए थे.हमसे भी कहने लगे आंटी बैठ कर पार करिये पर हम धीरे धीरे पैर रख कर पार हो गये.फ़िर आयी दूसरी धारा.यह काफ़ी गहरी भीथी और पानी का प्रवाह भी तेज था पर इसे पार तो करना ही था क्योंकि दाये बाये घूम कर कोई रास्ता नही था.हम लोगो ने प्रक्रितिको सर नवाया और उतर लिये पानी मे.अगर जरा सा चूक हो जाती तो पानी के साथ थोड़ी दूर तो बह ही जाते और चोट लगती सो अलग पर हम लोग सही सलामत पार हो लिये.जूतो मे पानीभर गया .कपड़े भी गीले हुए पर जो सुख हम उठा रहे थे उसके सामने ये सब तो कोई मायने नही रखता.हम लोग जब उस पार पहुचे तो हमे तीन बालक और मिले .ये लोग उसी धारा को और ऊपर से पार कर के आ रहे थे.इनसे अच्छा परिचय हो गया और आज भी मेल के जरिये हम सम्पर्क मे है.कभी कभी यूं ही चलते चलाते अन्जान लोगो से भी कैसी आत्मियता हो जाती है.प्रक्रिति के आंचल मे बिताये गये उन पलो के साथ ये रिश्ते तो बोनस है.
वहां से काफ़ी दूर तक हम छः लोग साथ चले .परिचय हुआ ,बाते हुई और हम आगे बढते रहे.कफ़ी आगे जाने परहम लोगो ने उनसे कहा कि वे खड़ी चढायी वाले छोटे रास्ते से जाना चहते है तो निकल जाये हम लोग घूम कर धीरे धीरे ही चढेगे.वे जाना चाहते भी थे और साथ छोड़ जाने से हिचक भी रहे थे पर हम लोगो ने उन्हे अन्त्ततः भेज ही दिया.
सुंदर से भी मैने कहा कि वे फोटो क्लिक करने के लिये अपनी सुविधा से आगे बढे और हम अपने हिसाब से नेचर से मुखातिब होगे .अब हम और सामने फ़ैली हरियाली आमने सामने थे बिल्कुल अकेले बस एक दूसरे के साथ.हम जिस जगह पर खड़े थे वहां से नीचे सीधी ढलान थी और नीचे दूर दूर तक फ़ैली घाटी और घाटी के उस पार उसे बाहों के घेरे मे लिये ,एक दूसरे क हाथ थामे पहाड़ियों की कतार.बादल खूब नीचे तक झुक आये थे .वे केवल पहाड़ियों की चोटियों पर हि नहीं मडरा रहे थे वरन समूची घाटी मे भी चहलकदमी कर रहे थे .चारों ऒर बादलो की छाया थी.तभी घाटी के परले सिरे पर सूरज की किरणो ने आहिस्ता से कदम रखा.जैसे तैरती हुई रौशनी उस सिरे से दाखिल हुई और अपनी जादू की छड़ी घुमा ,सारे पेड़ पौधों को जीवन्त कर दिया.ऐसा लगा अब तक गहरी नींद मे डूबे थे और रौशनी का स्पर्श पा चौंक कर आंखे खोल दी हो.अब तक भारी मन से बहती हवाओं का अंदाज़ भी चुहल भरा हो गया.कित्ने करिश्माई अंदाज़ है ऊपर वाले के पास भी .पल भर मे ही अंदर बाहर सब बदल के रख देता है.
खैर हमने अपने मन को उस पल के जादू से जबरन अलग किया और आगे बढे.यूं अब तक हम वापस चलने की मूड मे थे .पता था एक्दम ऊपर लौह्गढ तक जा कर आने मे बहुत समय लग जायेगा और घर पर का्नपुर से मीसा की भाभी और भतीजी को आना था.हम यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि हम घर उनके पहुंचने के बाद पहुंचे.पर सुंदर को लालच आ रहा था कि थोड़ा आगे और चले क्या पता कुछ बहुत अच्छा क्लिक करने को मिल जाये.सच भी था कितनी मुश्किल से तो यूं साथ बाहर निकलने का मौका हाथ आया था.लेकिन हमने देखा कि सुंदर वापस आ रहे है.कैमरे का लेन्स बाहर आ गया था.सुंदर को कैमरे की आंख से देखने और देखने ही क्यों मह्सूसने की भी आदत हो गयी है.लेकिन इस समय तो मेरे लिये यही बात फ़ाय्दे की बन गयी और सुदर सहर्ष वापस आने को तैयार हो गये .हलां कि कैमरे की चिन्ता थी पर अब घर पहुंचने की जल्दी भी थी.
सच कहे तो इतना संतुष्ट था मन कि कैमरे के बिगड़ जाने ने भी मन के उस भाव को भंग नही किया और हम वापस आये एक भरा पूरा दिन बिता कर.साथ आयी बहुत सारी सुखद स्म्रिरितियां.

छोटा सा स्टेशन जो साल के बाकी महीने तो ऊंघता रहता है पर बारिश के आते ही अंगडाई ले उठ बैठता है.सोता रह भी कैसे सकता है.उमगते,उछलते,संभल संभल चलते अनिगिनित कदमोकी आहटे रोज़ दस्तक देती है यहां मानसून मे.उस दिन भी बहुत सारे ग्रुप उतरे लोकल से .बाहर आते ही ,सामने हरियाली से लदे पहाड़ो से आती हवाओं ने भाग कर आ कर स्वागत किया .सामने ही तीन चार टीन टप्पर वाली दुकाने थी ,चाय नाश्ते की.चाय पी कर हम पैदल ही आगे बढ लिये.
आगे पीछे और भी लोग चल रहे थे.पुल पर से एक्स्प्रेस हाइवे दिखाई पड रहा था.नीचे भागती हुई कारे जैसे किसि और ही दुनिया मे थी.हल्कि फ़ुल्कि बूंदा बांदी हो रही थी .सब ताजगी से भरा.सामने अब आ गया था झरना .यह झरना जैसे मलवली के प्रवेशद्वार पर है.बगल से रास्ता चला जाता है लोह्गढ को और सामने बनी सीढीयां भाजा गुफ़ाओ की ओर.पर पहले झरने की बात.बहुत ऊंचाई से गिरता आता ,यह जलप्रपात काफ़ी बड़ा है पर बहुत शांत.गोदी मे के बच्चो से ले कर बुजुर्गवार तक सब इसके आगोश मे नश्चिन्त हो प्राकृर्तिक सुख का आनन्द उठा सकते है.चौड़ी चौड़ी चट्टानो से हो कर बहती इसकी जलधाराए सुकून का एह्सास दिलाती हैं .
हम लोग इस झरने पर अधिक देर ना रुक कर भाजा की सीढीयो की ओर बढ़ लिये.जैसा कि अधिक्तर बौध गुफ़ाओ मे होता है यहां भी बीच मे चैत्य सभाग्रह है. यह कार्ला के चैत्य सभाग्रिह से कम भव्य होते हुए भी काफ़ी आकर्षक है.सच तोयह है कि सदियो के पन्ने पलट जब भी किसी ऐसी चौखट पर जा खड़े हो तो मन जैसे किसि और ही तरह का हो जाता है और फ़िर इतिहास की निःश्ब्द ध्वनियाँ स्वयमेव ही उंगली पकड़ ले चलती है बीते वक्त के गलियारों मे.गुफ़ाओं के बाहर खुली जगह है जहां से सामने की घाटी और घाटी के उस पार के पहाड़ ,इस दिशा से उस दिशा तक खिचे दिखायी पड़ते है.जितनी देर सुन्दर ने सभाग्रिह के खम्भों,स्तूप,गोलाकार छत और नक्काशीदार स्तम्भो को कैमरे मे कैद किया उतनीदेर हमने गुफ़ा के पास बनी ऊपर को जाती सीढीयो पर बैठ चारो ओर की हरियाली को छ्क कर पिया.
फ़िर हम उसी दिशा मे आगे बढे.कुछ ही दूरी पर सकरे रास्ते पर पांच स्तूप बने थे एक कतार मे जैसे.क्यों बनाये गये होगे ये स्तूप यहां खुले मे.वैसे हमे पढना भी चाहिये कि क्यों बनाये जाते थे स्तूप.हां तो बारिश मे भीगते इस स्तूपो को देख मेरे मन मे एक अजीब सा दुख भरा भाव पैदा हुआ.जैसे किसी सुनसान से रास्ते पर अकेले जाते हुए बच्चे को देख कर होता है ना वैसे ही.थोड़ा और आगे चलने पर एक बहुत ही खूबसूरत अनुभव हमारा इंतजार कर रहा था .एक छोटी सी गुफ़ा की दीवारो पर बहुत सुंदर चित्र उकेरे गये थे.ऐसा लग रहा था किसी पुराने शिल्प्कार का स्टूडियो हो जैसे.यूं भी चट्टानो पर उकेरे गये चित्रो मे एक अद्भुत संगीत बसता है.जैसे जैसे बारीक रेखायो पर नज़र ठिठक ठिठक आगे बढती है सदियो पहले की वह छॆनी हथौड़ी की आवाज पत्थरो से झरने लगती है.सात घोड़ो के रथ पर सवार सूर्य,समूचे लावा लश्कर के साथ एरावत पर सवार इंद्र की सवारी,मनोहारी केश विन्यास ,छलकते भाव,धनुष बाण,नक्काशीदार खम्बे.............कौन होगा भला वह जिसने इस एकांत को अपनी साधना स्थली बनाया होगा.
इस गुफ़ा से सट कर शुरु होती है एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी पर्वत श्रंखलाये.ऊपर से नीचे तक हरियाली से लदी,चारो ओर जहां तक नज़र जाये.एक झरना वेग से हरहराता नीचे को भागा चला जा रहा था.हम काफ़ी उचायी पर थे ,पर जलप्रपात का उदगम कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था और नीचे को भागी जाती जलधारा भी कुछ दूरी के बाद हरियाली के बीच कहीं गुम हो गयी थी.यह झरना गुफ़ा के इतने पास था कि पानी के उड़ते छीटॆ हमे भिगो रहे थे.तन मन दोनोभीगे.इसी गुफ़ा के पास मिली थी हमे चार नन्दो और एक भाभी की वह टॊली.पांच पांडव जैसी.सब लगभग एक साइज़ की.उनकी फ़ोटो खीची हम लोगो ने गुफ़ा के खम्बोके बीच खड़े.ऐसा लग रहा था गिन कर खम्बे उन्ही लोगो के लिये बनाये गये हो जैसे.
उस गुफ़ा के बाद वापस लौटना होता है .कुछ लोग जीना उतर कर नीचे तक जाते है और फ़िर लौहगढ जाने के लिये बनी हुई सड़क से वापस ऊपर चढते है और कुछ लोग खास कर लडको के ग्रुप्स वगैरह चैत्य हाल के सामने से ढलान पर नीचे उतर जाते है और फ़िर झाड़ियो ,पेड़ो के बीच से ,चट्टानो पर चढते उतरते,तेजी से बहती पानी की धाराओ को पार करते हुए काफ़ी आगे जा कर लौह्गढ जाने के रास्ते पर जा मिलते है.हमने भी यही रास्ता चुना.हांहां हमे मालूम है कि ऐसे एड्वेन्चर करने की हम लोगो की उम्र नही रह गयी पर भला प्रक्रिति के आंचल मे जा कर भी खुद को भूल ना पाये तो भला क्या खाक आनन्द उठाया .और फ़िर मेरा मानना है कि अगर स्वयम को प्रक्रितिक शक्तियो के हवाले कर दो तो वे आपकी रक्छाखुद ही करती है.मुश्किल तो तब होती है जब आदमी उन अद्रिश्य प्राक्रितिक शक्तियो को नीचा दिखाने की ,उन पर अंकुश लगाने की कोशिश करता है.जब भी हमे अपनी ही ताकत पर कुछ ज्यादा ही गुमान होने लगता है ,वह सत्ता हमे कोई न कोई झटका दे समझाने की कोशिश करती है,संभलने का मौका देती है पर हम है कि बाज ही नही आते.
हां ,तो हम लोग मन मे विश्वास रख चल पडे.थोड़ी देर बाद लोग नज़र आने बंद हो गये.पैरो के नीचे भीगी हरी घास ,फिसलन भरी चट्टाने,अलग अलग तरह की वनस्पतियाँ,कहीं बीच बीच मे कच्ची सी पगडंडी जो थोड़ी दूर जा कर ना जाने कहां खो जाती थी.कभी कभी दूर से आती लोगो की आवाजे सुनायी देती पर लोग दिखायी नही देते.एक अद्रिश्य साथ,एक अनबोले सहारे की अनुभुति.पीछे मुड़ कर देखने पर दूर पहाड थे .चारो ओर से हरियाली का उमड़ता आता समुन्दर.आंखे बंद करो तो लहरो के झूले मे आहिस्ता आहिस्ता झूलने का एह्सास होने लगे.
हम लोग कुछ और आगे बढे तो ऊपर से बह कर आती पानी की धारा मिली.यह धारा बहुत तेज भी नही थी और बहुत गहरी भी नही.हां आस पास की चट्टाने खासी फिसलन भरी थी और धारा पार करने के लिये पानी से भीगी चट्टानो पर पैर रख कर पार जाना था.यहां हमे कुछ लड़के मिले.ये दूसरे रास्ते से आये थे और उछल कूद के चक्कर मे इनमे से एक आध फ़िसल कर गिर चुके थे और जोर से लगी चोटो से थोड़े घबडाये हुए थे.हमसे भी कहने लगे आंटी बैठ कर पार करिये पर हम धीरे धीरे पैर रख कर पार हो गये.फ़िर आयी दूसरी धारा.यह काफ़ी गहरी भीथी और पानी का प्रवाह भी तेज था पर इसे पार तो करना ही था क्योंकि दाये बाये घूम कर कोई रास्ता नही था.हम लोगो ने प्रक्रितिको सर नवाया और उतर लिये पानी मे.अगर जरा सा चूक हो जाती तो पानी के साथ थोड़ी दूर तो बह ही जाते और चोट लगती सो अलग पर हम लोग सही सलामत पार हो लिये.जूतो मे पानीभर गया .कपड़े भी गीले हुए पर जो सुख हम उठा रहे थे उसके सामने ये सब तो कोई मायने नही रखता.हम लोग जब उस पार पहुचे तो हमे तीन बालक और मिले .ये लोग उसी धारा को और ऊपर से पार कर के आ रहे थे.इनसे अच्छा परिचय हो गया और आज भी मेल के जरिये हम सम्पर्क मे है.कभी कभी यूं ही चलते चलाते अन्जान लोगो से भी कैसी आत्मियता हो जाती है.प्रक्रिति के आंचल मे बिताये गये उन पलो के साथ ये रिश्ते तो बोनस है.
वहां से काफ़ी दूर तक हम छः लोग साथ चले .परिचय हुआ ,बाते हुई और हम आगे बढते रहे.कफ़ी आगे जाने परहम लोगो ने उनसे कहा कि वे खड़ी चढायी वाले छोटे रास्ते से जाना चहते है तो निकल जाये हम लोग घूम कर धीरे धीरे ही चढेगे.वे जाना चाहते भी थे और साथ छोड़ जाने से हिचक भी रहे थे पर हम लोगो ने उन्हे अन्त्ततः भेज ही दिया.
सुंदर से भी मैने कहा कि वे फोटो क्लिक करने के लिये अपनी सुविधा से आगे बढे और हम अपने हिसाब से नेचर से मुखातिब होगे .अब हम और सामने फ़ैली हरियाली आमने सामने थे बिल्कुल अकेले बस एक दूसरे के साथ.हम जिस जगह पर खड़े थे वहां से नीचे सीधी ढलान थी और नीचे दूर दूर तक फ़ैली घाटी और घाटी के उस पार उसे बाहों के घेरे मे लिये ,एक दूसरे क हाथ थामे पहाड़ियों की कतार.बादल खूब नीचे तक झुक आये थे .वे केवल पहाड़ियों की चोटियों पर हि नहीं मडरा रहे थे वरन समूची घाटी मे भी चहलकदमी कर रहे थे .चारों ऒर बादलो की छाया थी.तभी घाटी के परले सिरे पर सूरज की किरणो ने आहिस्ता से कदम रखा.जैसे तैरती हुई रौशनी उस सिरे से दाखिल हुई और अपनी जादू की छड़ी घुमा ,सारे पेड़ पौधों को जीवन्त कर दिया.ऐसा लगा अब तक गहरी नींद मे डूबे थे और रौशनी का स्पर्श पा चौंक कर आंखे खोल दी हो.अब तक भारी मन से बहती हवाओं का अंदाज़ भी चुहल भरा हो गया.कित्ने करिश्माई अंदाज़ है ऊपर वाले के पास भी .पल भर मे ही अंदर बाहर सब बदल के रख देता है.
खैर हमने अपने मन को उस पल के जादू से जबरन अलग किया और आगे बढे.यूं अब तक हम वापस चलने की मूड मे थे .पता था एक्दम ऊपर लौह्गढ तक जा कर आने मे बहुत समय लग जायेगा और घर पर का्नपुर से मीसा की भाभी और भतीजी को आना था.हम यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि हम घर उनके पहुंचने के बाद पहुंचे.पर सुंदर को लालच आ रहा था कि थोड़ा आगे और चले क्या पता कुछ बहुत अच्छा क्लिक करने को मिल जाये.सच भी था कितनी मुश्किल से तो यूं साथ बाहर निकलने का मौका हाथ आया था.लेकिन हमने देखा कि सुंदर वापस आ रहे है.कैमरे का लेन्स बाहर आ गया था.सुंदर को कैमरे की आंख से देखने और देखने ही क्यों मह्सूसने की भी आदत हो गयी है.लेकिन इस समय तो मेरे लिये यही बात फ़ाय्दे की बन गयी और सुदर सहर्ष वापस आने को तैयार हो गये .हलां कि कैमरे की चिन्ता थी पर अब घर पहुंचने की जल्दी भी थी.
सच कहे तो इतना संतुष्ट था मन कि कैमरे के बिगड़ जाने ने भी मन के उस भाव को भंग नही किया और हम वापस आये एक भरा पूरा दिन बिता कर.साथ आयी बहुत सारी सुखद स्म्रिरितियां.
एक दिन मलवली की पहाडियों मे
मानसून आने के बाद से हर हफ़्ते मुम्बई से पुणे आने पर सुन्दर रास्ते के खूबसूरत द्रिश्यों के वर्णन से भरे रहते थे.और इस सप्ताह जब लगातार तीन छुट्टियां पड़ी तो सुन्दर ने कहा चलो तुम्हे भी उन द्रिश्यों से मिलवा लाये.पता है ना सुनदर को कि हमे पर्क्रिति सन्ग बिताये गये पल कितने प्यारे है .तो पिछले रविवार यानि१७ तारीख को सबेरे हम लोग चल दिये मलवली की ओर.घर में ही साढे सात बज गये थे सुंदर ने कहा अब आठ वाली लोकल तो लगता है मिलेगी नहीं.क्या एक घंटे बाद निकला जाय.हम तो बस निकलने के उतसाह से भरे थे तो बोले नहीं अब तैयार है तो अभी निकलेगे .लोकल छूट गयी तो वहीं प्लेटफ़ार्म पर घूमेगे,बारिश मे भीगती पटरिया देखेगे और चाय पीते हुए अगली लोकल का इन्त्ज़ार करेगे.तो जूते कस कर हम निकल पडे .और देखिये इधर हम लोग शिवाजी नगर पहुंचे और उधर आठ की लोकल के आने की सनसनी फ़ैली.तो गरज यह कि भागते दौड़ते हम लोग हो गये ट्रेन पर सवार.हमे लगा कि यह अच्छा शगुन हुआ है और दिन उत्साह भरा,उमगा उमगा ही बीतना चाहिये.घंटे भर मे हम मलवली पहुंच गये.
छोटा सा स्टेशन जो साल के बाकी महीने तो ऊंघता रहता है पर बारिश के आते ही अंगडाई ले उठ बैठता है.सोता रह भी कैसे सकता है.उमगते,उछलते,संभल संभल चलते अनिगिनित कदमोकी आहटे रोज़ दस्तक देती है यहां मानसून मे.उस दिन भी बहुत सारे ग्रुप उतरे लोकल से .बाहर आते ही ,सामने हरियाली से लदे पहाड़ो से आती हवाओं ने भाग कर आ कर स्वागत किया .सामने ही तीन चार टीन टप्पर वाली दुकाने थी ,चाय नाश्ते की.चाय पी कर हम पैदल ही आगे बढ लिये.
आगे पीछे और भी लोग चल रहे थे.पुल पर से एक्स्प्रेस हाइवे दिखाई पड रहा था.नीचे भागती हुई कारे जैसे किसि और ही दुनिया मे थी.हल्कि फ़ुल्कि बूंदा बांदी हो रही थी .सब ताजगी से भरा.सामने अब आ गया था झरना .यह झरना जैसे मलवली के प्रवेशद्वार पर है.बगल से रास्ता चला जाता है लोह्गढ को और सामने बनी सीढीयां भाजा गुफ़ाओ की ओर.पर पहले झरने की बात.बहुत ऊंचाई से गिरता आता ,यह जलप्रपात काफ़ी बड़ा है पर बहुत शांत.गोदी मे के बच्चो से ले कर बुजुर्गवार तक सब इसके आगोश मे नश्चिन्त हो प्राकृर्तिक सुख का आनन्द उठा सकते है.चौड़ी चौड़ी चट्टानो से हो कर बहती इसकी जलधाराए सुकून का एह्सास दिलाती हैं .
हम लोग इस झरने पर अधिक देर ना रुक कर भाजा की सीढीयो की ओर बढ़ लिये.जैसा कि अधिक्तर बौध गुफ़ाओ मे होता है यहां भी बीच मे चैत्य सभाग्रह है. यह कार्ला के चैत्य सभाग्रिह से कम भव्य होते हुए भी काफ़ी आकर्षक है.सच तोयह है कि सदियो के पन्ने पलट जब भी किसी ऐसी चौखट पर जा खड़े हो तो मन जैसे किसि और ही तरह का हो जाता है और फ़िर इतिहास की निःश्ब्द ध्वनियाँ स्वयमेव ही उंगली पकड़ ले चलती है बीते वक्त के गलियारों मे.गुफ़ाओं के बाहर खुली जगह है जहां से सामने की घाटी और घाटी के उस पार के पहाड़ ,इस दिशा से उस दिशा तक खिचे दिखायी पड़ते है.जितनी देर सुन्दर ने सभाग्रिह के खम्भों,स्तूप,गोलाकार छत और नक्काशीदार स्तम्भो को कैमरे मे कैद किया उतनीदेर हमने गुफ़ा के पास बनी ऊपर को जाती सीढीयो पर बैठ चारो ओर की हरियाली को छ्क कर पिया.
फ़िर हम उसी दिशा मे आगे बढे.कुछ ही दूरी पर सकरे रास्ते पर पांच स्तूप बने थे एक कतार मे जैसे.क्यों बनाये गये होगे ये स्तूप यहां खुले मे.वैसे हमे पढना भी चाहिये कि क्यों बनाये जाते थे स्तूप.हां तो बारिश मे भीगते इस स्तूपो को देख मेरे मन मे एक अजीब सा दुख भरा भाव पैदा हुआ.जैसे किसी सुनसान से रास्ते पर अकेले जाते हुए बच्चे को देख कर होता है ना वैसे ही.थोड़ा और आगे चलने पर एक बहुत ही खूबसूरत अनुभव हमारा इंतजार कर रहा था .एक छोटी सी गुफ़ा की दीवारो पर बहुत सुंदर चित्र उकेरे गये थे.ऐसा लग रहा था किसी पुराने शिल्प्कार का स्टूडियो हो जैसे.यूं भी चट्टानो पर उकेरे गये चित्रो मे एक अद्भुत संगीत बसता है.जैसे जैसे बारीक रेखायो पर नज़र ठिठक ठिठक आगे बढती है सदियो पहले की वह छॆनी हथौड़ी की आवाज पत्थरो से झरने लगती है.सात घोड़ो के रथ पर सवार सूर्य,समूचे लावा लश्कर के साथ एरावत पर सवार इंद्र की सवारी,मनोहारी केश विन्यास ,छलकते भाव,धनुष बाण,नक्काशीदार खम्बे.............कौन होगा भला वह जिसने इस एकांत को अपनी साधना स्थली बनाया होगा.
इस गुफ़ा से सट कर शुरु होती है एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी पर्वत श्रंखलाये.ऊपर से नीचे तक हरियाली से लदी,चारो ओर जहां तक नज़र जाये.एक झरना वेग से हरहराता नीचे को भागा चला जा रहा था.हम काफ़ी उचायी पर थे ,पर जलप्रपात का उदगम कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था और नीचे को भागी जाती जलधारा भी कुछ दूरी के बाद हरियाली के बीच कहीं गुम हो गयी थी.यह झरना गुफ़ा के इतने पास था कि पानी के उड़ते छीटॆ हमे भिगो रहे थे.तन मन दोनोभीगे.इसी गुफ़ा के पास मिली थी हमे चार नन्दो और एक भाभी की वह टॊली.पांच पांडव जैसी.सब लगभग एक साइज़ की.उनकी फ़ोटो खीची हम लोगो ने गुफ़ा के खम्बोके बीच खड़े.ऐसा लग रहा था गिन कर खम्बे उन्ही लोगो के लिये बनाये गये हो जैसे.
उस गुफ़ा के बाद वापस लौटना होता है .कुछ लोग जीना उतर कर नीचे तक जाते है और फ़िर लौहगढ जाने के लिये बनी हुई सड़क से वापस ऊपर चढते है और कुछ लोग खास कर लडको के ग्रुप्स वगैरह चैत्य हाल के सामने से ढलान पर नीचे उतर जाते है और फ़िर झाड़ियो ,पेड़ो के बीच से ,चट्टानो पर चढते उतरते,तेजी से बहती पानी की धाराओ को पार करते हुए काफ़ी आगे जा कर लौह्गढ जाने के रास्ते पर जा मिलते है.हमने भी यही रास्ता चुना.हांहां हमे मालूम है कि ऐसे एड्वेन्चर करने की हम लोगो की उम्र नही रह गयी पर भला प्रक्रिति के आंचल मे जा कर भी खुद को भूल ना पाये तो भला क्या खाक आनन्द उठाया .और फ़िर मेरा मानना है कि अगर स्वयम को प्रक्रितिक शक्तियो के हवाले कर दो तो वे आपकी रक्छाखुद ही करती है.मुश्किल तो तब होती है जब आदमी उन अद्रिश्य प्राक्रितिक शक्तियो को नीचा दिखाने की ,उन पर अंकुश लगाने की कोशिश करता है.जब भी हमे अपनी ही ताकत पर कुछ ज्यादा ही गुमान होने लगता है ,वह सत्ता हमे कोई न कोई झटका दे समझाने की कोशिश करती है,संभलने का मौका देती है पर हम है कि बाज ही नही आते.
हां ,तो हम लोग मन मे विश्वास रख चल पडे.थोड़ी देर बाद लोग नज़र आने बंद हो गये.पैरो के नीचे भीगी हरी घास ,फिसलन भरी चट्टाने,अलग अलग तरह की वनस्पतियाँ,कहीं बीच बीच मे कच्ची सी पगडंडी जो थोड़ी दूर जा कर ना जाने कहां खो जाती थी.कभी कभी दूर से आती लोगो की आवाजे सुनायी देती पर लोग दिखायी नही देते.एक अद्रिश्य साथ,एक अनबोले सहारे की अनुभुति.पीछे मुड़ कर देखने पर दूर पहाड थे .चारो ओर से हरियाली का उमड़ता आता समुन्दर.आंखे बंद करो तो लहरो के झूले मे आहिस्ता आहिस्ता झूलने का एह्सास होने लगे.
हम लोग कुछ और आगे बढे तो ऊपर से बह कर आती पानी की धारा मिली.यह धारा बहुत तेज भी नही थी और बहुत गहरी भी नही.हां आस पास की चट्टाने खासी फिसलन भरी थी और धारा पार करने के लिये पानी से भीगी चट्टानो पर पैर रख कर पार जाना था.यहां हमे कुछ लड़के मिले.ये दूसरे रास्ते से आये थे और उछल कूद के चक्कर मे इनमे से एक आध फ़िसल कर गिर चुके थे और जोर से लगी चोटो से थोड़े घबडाये हुए थे.हमसे भी कहने लगे आंटी बैठ कर पार करिये पर हम धीरे धीरे पैर रख कर पार हो गये.फ़िर आयी दूसरी धारा.यह काफ़ी गहरी भीथी और पानी का प्रवाह भी तेज था पर इसे पार तो करना ही था क्योंकि दाये बाये घूम कर कोई रास्ता नही था.हम लोगो ने प्रक्रितिको सर नवाया और उतर लिये पानी मे.अगर जरा सा चूक हो जाती तो पानी के साथ थोड़ी दूर तो बह ही जाते और चोट लगती सो अलग पर हम लोग सही सलामत पार हो लिये.जूतो मे पानीभर गया .कपड़े भी गीले हुए पर जो सुख हम उठा रहे थे उसके सामने ये सब तो कोई मायने नही रखता.हम लोग जब उस पार पहुचे तो हमे तीन बालक और मिले .ये लोग उसी धारा को और ऊपर से पार कर के आ रहे थे.इनसे अच्छा परिचय हो गया और आज भी मेल के जरिये हम सम्पर्क मे है.कभी कभी यूं ही चलते चलाते अन्जान लोगो से भी कैसी आत्मियता हो जाती है.प्रक्रिति के आंचल मे बिताये गये उन पलो के साथ ये रिश्ते तो बोनस है.
वहां से काफ़ी दूर तक हम छः लोग साथ चले .परिचय हुआ ,बाते हुई और हम आगे बढते रहे.कफ़ी आगे जाने परहम लोगो ने उनसे कहा कि वे खड़ी चढायी वाले छोटे रास्ते से जाना चहते है तो निकल जाये हम लोग घूम कर धीरे धीरे ही चढेगे.वे जाना चाहते भी थे और साथ छोड़ जाने से हिचक भी रहे थे पर हम लोगो ने उन्हे अन्त्ततः भेज ही दिया.
सुंदर से भी मैने कहा कि वे फोटो क्लिक करने के लिये अपनी सुविधा से आगे बढे और हम अपने हिसाब से नेचर से मुखातिब होगे .अब हम और सामने फ़ैली हरियाली आमने सामने थे बिल्कुल अकेले बस एक दूसरे के साथ.हम जिस जगह पर खड़े थे वहां से नीचे सीधी ढलान थी और नीचे दूर दूर तक फ़ैली घाटी और घाटी के उस पार उसे बाहों के घेरे मे लिये ,एक दूसरे क हाथ थामे पहाड़ियों की कतार.बादल खूब नीचे तक झुक आये थे .वे केवल पहाड़ियों की चोटियों पर हि नहीं मडरा रहे थे वरन समूची घाटी मे भी चहलकदमी कर रहे थे .चारों ऒर बादलो की छाया थी.तभी घाटी के परले सिरे पर सूरज की किरणो ने आहिस्ता से कदम रखा.जैसे तैरती हुई रौशनी उस सिरे से दाखिल हुई और अपनी जादू की छड़ी घुमा ,सारे पेड़ पौधों को जीवन्त कर दिया.ऐसा लगा अब तक गहरी नींद मे डूबे थे और रौशनी का स्पर्श पा चौंक कर आंखे खोल दी हो.अब तक भारी मन से बहती हवाओं का अंदाज़ भी चुहल भरा हो गया.कित्ने करिश्माई अंदाज़ है ऊपर वाले के पास भी .पल भर मे ही अंदर बाहर सब बदल के रख देता है.
खैर हमने अपने मन को उस पल के जादू से जबरन अलग किया और आगे बढे.यूं अब तक हम वापस चलने की मूड मे थे .पता था एक्दम ऊपर लौह्गढ तक जा कर आने मे बहुत समय लग जायेगा और घर पर का्नपुर से मीसा की भाभी और भतीजी को आना था.हम यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि हम घर उनके पहुंचने के बाद पहुंचे.पर सुंदर को लालच आ रहा था कि थोड़ा आगे और चले क्या पता कुछ बहुत अच्छा क्लिक करने को मिल जाये.सच भी था कितनी मुश्किल से तो यूं साथ बाहर निकलने का मौका हाथ आया था.लेकिन हमने देखा कि सुंदर वापस आ रहे है.कैमरे का लेन्स बाहर आ गया था.सुंदर को कैमरे की आंख से देखने और देखने ही क्यों मह्सूसने की भी आदत हो गयी है.लेकिन इस समय तो मेरे लिये यही बात फ़ाय्दे की बन गयी और सुदर सहर्ष वापस आने को तैयार हो गये .हलां कि कैमरे की चिन्ता थी पर अब घर पहुंचने की जल्दी भी थी.
सच कहे तो इतना संतुष्ट था मन कि कैमरे के बिगड़ जाने ने भी मन के उस भाव को भंग नही किया और हम वापस आये एक भरा पूरा दिन बिता कर.साथ आयी बहुत सारी सुखद स्म्रिरितियां.

छोटा सा स्टेशन जो साल के बाकी महीने तो ऊंघता रहता है पर बारिश के आते ही अंगडाई ले उठ बैठता है.सोता रह भी कैसे सकता है.उमगते,उछलते,संभल संभल चलते अनिगिनित कदमोकी आहटे रोज़ दस्तक देती है यहां मानसून मे.उस दिन भी बहुत सारे ग्रुप उतरे लोकल से .बाहर आते ही ,सामने हरियाली से लदे पहाड़ो से आती हवाओं ने भाग कर आ कर स्वागत किया .सामने ही तीन चार टीन टप्पर वाली दुकाने थी ,चाय नाश्ते की.चाय पी कर हम पैदल ही आगे बढ लिये.
आगे पीछे और भी लोग चल रहे थे.पुल पर से एक्स्प्रेस हाइवे दिखाई पड रहा था.नीचे भागती हुई कारे जैसे किसि और ही दुनिया मे थी.हल्कि फ़ुल्कि बूंदा बांदी हो रही थी .सब ताजगी से भरा.सामने अब आ गया था झरना .यह झरना जैसे मलवली के प्रवेशद्वार पर है.बगल से रास्ता चला जाता है लोह्गढ को और सामने बनी सीढीयां भाजा गुफ़ाओ की ओर.पर पहले झरने की बात.बहुत ऊंचाई से गिरता आता ,यह जलप्रपात काफ़ी बड़ा है पर बहुत शांत.गोदी मे के बच्चो से ले कर बुजुर्गवार तक सब इसके आगोश मे नश्चिन्त हो प्राकृर्तिक सुख का आनन्द उठा सकते है.चौड़ी चौड़ी चट्टानो से हो कर बहती इसकी जलधाराए सुकून का एह्सास दिलाती हैं .
हम लोग इस झरने पर अधिक देर ना रुक कर भाजा की सीढीयो की ओर बढ़ लिये.जैसा कि अधिक्तर बौध गुफ़ाओ मे होता है यहां भी बीच मे चैत्य सभाग्रह है. यह कार्ला के चैत्य सभाग्रिह से कम भव्य होते हुए भी काफ़ी आकर्षक है.सच तोयह है कि सदियो के पन्ने पलट जब भी किसी ऐसी चौखट पर जा खड़े हो तो मन जैसे किसि और ही तरह का हो जाता है और फ़िर इतिहास की निःश्ब्द ध्वनियाँ स्वयमेव ही उंगली पकड़ ले चलती है बीते वक्त के गलियारों मे.गुफ़ाओं के बाहर खुली जगह है जहां से सामने की घाटी और घाटी के उस पार के पहाड़ ,इस दिशा से उस दिशा तक खिचे दिखायी पड़ते है.जितनी देर सुन्दर ने सभाग्रिह के खम्भों,स्तूप,गोलाकार छत और नक्काशीदार स्तम्भो को कैमरे मे कैद किया उतनीदेर हमने गुफ़ा के पास बनी ऊपर को जाती सीढीयो पर बैठ चारो ओर की हरियाली को छ्क कर पिया.
फ़िर हम उसी दिशा मे आगे बढे.कुछ ही दूरी पर सकरे रास्ते पर पांच स्तूप बने थे एक कतार मे जैसे.क्यों बनाये गये होगे ये स्तूप यहां खुले मे.वैसे हमे पढना भी चाहिये कि क्यों बनाये जाते थे स्तूप.हां तो बारिश मे भीगते इस स्तूपो को देख मेरे मन मे एक अजीब सा दुख भरा भाव पैदा हुआ.जैसे किसी सुनसान से रास्ते पर अकेले जाते हुए बच्चे को देख कर होता है ना वैसे ही.थोड़ा और आगे चलने पर एक बहुत ही खूबसूरत अनुभव हमारा इंतजार कर रहा था .एक छोटी सी गुफ़ा की दीवारो पर बहुत सुंदर चित्र उकेरे गये थे.ऐसा लग रहा था किसी पुराने शिल्प्कार का स्टूडियो हो जैसे.यूं भी चट्टानो पर उकेरे गये चित्रो मे एक अद्भुत संगीत बसता है.जैसे जैसे बारीक रेखायो पर नज़र ठिठक ठिठक आगे बढती है सदियो पहले की वह छॆनी हथौड़ी की आवाज पत्थरो से झरने लगती है.सात घोड़ो के रथ पर सवार सूर्य,समूचे लावा लश्कर के साथ एरावत पर सवार इंद्र की सवारी,मनोहारी केश विन्यास ,छलकते भाव,धनुष बाण,नक्काशीदार खम्बे.............कौन होगा भला वह जिसने इस एकांत को अपनी साधना स्थली बनाया होगा.
इस गुफ़ा से सट कर शुरु होती है एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी पर्वत श्रंखलाये.ऊपर से नीचे तक हरियाली से लदी,चारो ओर जहां तक नज़र जाये.एक झरना वेग से हरहराता नीचे को भागा चला जा रहा था.हम काफ़ी उचायी पर थे ,पर जलप्रपात का उदगम कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था और नीचे को भागी जाती जलधारा भी कुछ दूरी के बाद हरियाली के बीच कहीं गुम हो गयी थी.यह झरना गुफ़ा के इतने पास था कि पानी के उड़ते छीटॆ हमे भिगो रहे थे.तन मन दोनोभीगे.इसी गुफ़ा के पास मिली थी हमे चार नन्दो और एक भाभी की वह टॊली.पांच पांडव जैसी.सब लगभग एक साइज़ की.उनकी फ़ोटो खीची हम लोगो ने गुफ़ा के खम्बोके बीच खड़े.ऐसा लग रहा था गिन कर खम्बे उन्ही लोगो के लिये बनाये गये हो जैसे.
उस गुफ़ा के बाद वापस लौटना होता है .कुछ लोग जीना उतर कर नीचे तक जाते है और फ़िर लौहगढ जाने के लिये बनी हुई सड़क से वापस ऊपर चढते है और कुछ लोग खास कर लडको के ग्रुप्स वगैरह चैत्य हाल के सामने से ढलान पर नीचे उतर जाते है और फ़िर झाड़ियो ,पेड़ो के बीच से ,चट्टानो पर चढते उतरते,तेजी से बहती पानी की धाराओ को पार करते हुए काफ़ी आगे जा कर लौह्गढ जाने के रास्ते पर जा मिलते है.हमने भी यही रास्ता चुना.हांहां हमे मालूम है कि ऐसे एड्वेन्चर करने की हम लोगो की उम्र नही रह गयी पर भला प्रक्रिति के आंचल मे जा कर भी खुद को भूल ना पाये तो भला क्या खाक आनन्द उठाया .और फ़िर मेरा मानना है कि अगर स्वयम को प्रक्रितिक शक्तियो के हवाले कर दो तो वे आपकी रक्छाखुद ही करती है.मुश्किल तो तब होती है जब आदमी उन अद्रिश्य प्राक्रितिक शक्तियो को नीचा दिखाने की ,उन पर अंकुश लगाने की कोशिश करता है.जब भी हमे अपनी ही ताकत पर कुछ ज्यादा ही गुमान होने लगता है ,वह सत्ता हमे कोई न कोई झटका दे समझाने की कोशिश करती है,संभलने का मौका देती है पर हम है कि बाज ही नही आते.
हां ,तो हम लोग मन मे विश्वास रख चल पडे.थोड़ी देर बाद लोग नज़र आने बंद हो गये.पैरो के नीचे भीगी हरी घास ,फिसलन भरी चट्टाने,अलग अलग तरह की वनस्पतियाँ,कहीं बीच बीच मे कच्ची सी पगडंडी जो थोड़ी दूर जा कर ना जाने कहां खो जाती थी.कभी कभी दूर से आती लोगो की आवाजे सुनायी देती पर लोग दिखायी नही देते.एक अद्रिश्य साथ,एक अनबोले सहारे की अनुभुति.पीछे मुड़ कर देखने पर दूर पहाड थे .चारो ओर से हरियाली का उमड़ता आता समुन्दर.आंखे बंद करो तो लहरो के झूले मे आहिस्ता आहिस्ता झूलने का एह्सास होने लगे.
हम लोग कुछ और आगे बढे तो ऊपर से बह कर आती पानी की धारा मिली.यह धारा बहुत तेज भी नही थी और बहुत गहरी भी नही.हां आस पास की चट्टाने खासी फिसलन भरी थी और धारा पार करने के लिये पानी से भीगी चट्टानो पर पैर रख कर पार जाना था.यहां हमे कुछ लड़के मिले.ये दूसरे रास्ते से आये थे और उछल कूद के चक्कर मे इनमे से एक आध फ़िसल कर गिर चुके थे और जोर से लगी चोटो से थोड़े घबडाये हुए थे.हमसे भी कहने लगे आंटी बैठ कर पार करिये पर हम धीरे धीरे पैर रख कर पार हो गये.फ़िर आयी दूसरी धारा.यह काफ़ी गहरी भीथी और पानी का प्रवाह भी तेज था पर इसे पार तो करना ही था क्योंकि दाये बाये घूम कर कोई रास्ता नही था.हम लोगो ने प्रक्रितिको सर नवाया और उतर लिये पानी मे.अगर जरा सा चूक हो जाती तो पानी के साथ थोड़ी दूर तो बह ही जाते और चोट लगती सो अलग पर हम लोग सही सलामत पार हो लिये.जूतो मे पानीभर गया .कपड़े भी गीले हुए पर जो सुख हम उठा रहे थे उसके सामने ये सब तो कोई मायने नही रखता.हम लोग जब उस पार पहुचे तो हमे तीन बालक और मिले .ये लोग उसी धारा को और ऊपर से पार कर के आ रहे थे.इनसे अच्छा परिचय हो गया और आज भी मेल के जरिये हम सम्पर्क मे है.कभी कभी यूं ही चलते चलाते अन्जान लोगो से भी कैसी आत्मियता हो जाती है.प्रक्रिति के आंचल मे बिताये गये उन पलो के साथ ये रिश्ते तो बोनस है.
वहां से काफ़ी दूर तक हम छः लोग साथ चले .परिचय हुआ ,बाते हुई और हम आगे बढते रहे.कफ़ी आगे जाने परहम लोगो ने उनसे कहा कि वे खड़ी चढायी वाले छोटे रास्ते से जाना चहते है तो निकल जाये हम लोग घूम कर धीरे धीरे ही चढेगे.वे जाना चाहते भी थे और साथ छोड़ जाने से हिचक भी रहे थे पर हम लोगो ने उन्हे अन्त्ततः भेज ही दिया.
सुंदर से भी मैने कहा कि वे फोटो क्लिक करने के लिये अपनी सुविधा से आगे बढे और हम अपने हिसाब से नेचर से मुखातिब होगे .अब हम और सामने फ़ैली हरियाली आमने सामने थे बिल्कुल अकेले बस एक दूसरे के साथ.हम जिस जगह पर खड़े थे वहां से नीचे सीधी ढलान थी और नीचे दूर दूर तक फ़ैली घाटी और घाटी के उस पार उसे बाहों के घेरे मे लिये ,एक दूसरे क हाथ थामे पहाड़ियों की कतार.बादल खूब नीचे तक झुक आये थे .वे केवल पहाड़ियों की चोटियों पर हि नहीं मडरा रहे थे वरन समूची घाटी मे भी चहलकदमी कर रहे थे .चारों ऒर बादलो की छाया थी.तभी घाटी के परले सिरे पर सूरज की किरणो ने आहिस्ता से कदम रखा.जैसे तैरती हुई रौशनी उस सिरे से दाखिल हुई और अपनी जादू की छड़ी घुमा ,सारे पेड़ पौधों को जीवन्त कर दिया.ऐसा लगा अब तक गहरी नींद मे डूबे थे और रौशनी का स्पर्श पा चौंक कर आंखे खोल दी हो.अब तक भारी मन से बहती हवाओं का अंदाज़ भी चुहल भरा हो गया.कित्ने करिश्माई अंदाज़ है ऊपर वाले के पास भी .पल भर मे ही अंदर बाहर सब बदल के रख देता है.
खैर हमने अपने मन को उस पल के जादू से जबरन अलग किया और आगे बढे.यूं अब तक हम वापस चलने की मूड मे थे .पता था एक्दम ऊपर लौह्गढ तक जा कर आने मे बहुत समय लग जायेगा और घर पर का्नपुर से मीसा की भाभी और भतीजी को आना था.हम यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि हम घर उनके पहुंचने के बाद पहुंचे.पर सुंदर को लालच आ रहा था कि थोड़ा आगे और चले क्या पता कुछ बहुत अच्छा क्लिक करने को मिल जाये.सच भी था कितनी मुश्किल से तो यूं साथ बाहर निकलने का मौका हाथ आया था.लेकिन हमने देखा कि सुंदर वापस आ रहे है.कैमरे का लेन्स बाहर आ गया था.सुंदर को कैमरे की आंख से देखने और देखने ही क्यों मह्सूसने की भी आदत हो गयी है.लेकिन इस समय तो मेरे लिये यही बात फ़ाय्दे की बन गयी और सुदर सहर्ष वापस आने को तैयार हो गये .हलां कि कैमरे की चिन्ता थी पर अब घर पहुंचने की जल्दी भी थी.
सच कहे तो इतना संतुष्ट था मन कि कैमरे के बिगड़ जाने ने भी मन के उस भाव को भंग नही किया और हम वापस आये एक भरा पूरा दिन बिता कर.साथ आयी बहुत सारी सुखद स्म्रिरितियां.
Tuesday, September 9, 2008
मेरी डायरी के पन्ने भाग ३
एक पतला सा पानी का सांप ,पानी की सतह से तीन चार इंच ऊपर फ़न उठाये खड़ा था .हरहरा कर आती गंगा की लहरें उसे उखाड़ फ़ेकने का पूरा प्रयत्न करतीं और हर प्रहार से कांप कांप जाता उसका दुबला सा शरीर पर अगले ही पल एक नये निश्चय से फ़िर तन कर खड़ा हो जाता था वह.अपने अस्तित्व की सत्ता को बचाने का उसका यह संघर्ष बेहद प्रेरक था .हर लहर मानो यह कहती हुई आती थी कि तू मेरा आश्रित हो मुझसे अलग ,मुझसे ऊपर दिखने ्का साहस कैसे कर रहा है और हर झटके को पूरे साहस वह ,यह कहता प्रतीत होता ,किसी को आश्रय देने का अर्थ उसके अस्तित्व को मिटाना या नकारना नहीं होता .यह ठीक है कि तुम्हारे आंचल मे हमारा जीवन है किंतु मैं अपने ’मैं’ को तुममे कैसे विलय कर दूं .
कभी ऐसा लगता कि चारों ओर से उसे घेरती लहरें मानो विषम परिसिथितियों का झं झावत हो जो अपने नागपाश में लपेट उसे पछाड़ देने को उद्दत हों और हर वार लहरा कर सीधी होती उसकी काया ,यह कहती थी ,तुम हमसे अधिक शक्तिशाली हो किंतु मेरा मनोबल ,मेरी अपने अंदर बसती सम्भावनाओं के प्रति आस्था इतनी कमजोर नहीं कि तुम मुझे इतनी आसानी से उखाड़ फ़ेकने मे सफ़ल हो सको .यह भी हो सकता है कि अंत में तुम मुझे लील जाने में सफ़ल हो जाओ पर बिना संघर्ष के सम्र्पण कर दूं ,इतना कम्जोर मैं नहीं .उस नन्ह ेसे जीव का संघ्र्ष हमें विमुग्ध कर गया.मात्र मुग्ध ही नहीं बहुत कुछ दे गया .तुष्टि से उपजी शिथिलता ,्जिसमे कहीं शायद पलायन का भाव भी था रोज्मर्रा के जीवन की उठापटक से ,को झटक कर खड़े हो गये हम.चारो ओर द्रिष्टि घुमा कर अंदर तक उतारा द्रिश्यों को.एक बार देखा सामने धूप में चमकते मंदिरों के कलश को और फ़िर द्रिष्टि जमा दी उस सांप पर.मन मे ढेर सारी स्रद्धा भर सर झुकाया अपने प्रेरणा पुंज को और एक नये विश्वास से चल पड़े हम हाथ पकड़ कर.
कभी ऐसा लगता कि चारों ओर से उसे घेरती लहरें मानो विषम परिसिथितियों का झं झावत हो जो अपने नागपाश में लपेट उसे पछाड़ देने को उद्दत हों और हर वार लहरा कर सीधी होती उसकी काया ,यह कहती थी ,तुम हमसे अधिक शक्तिशाली हो किंतु मेरा मनोबल ,मेरी अपने अंदर बसती सम्भावनाओं के प्रति आस्था इतनी कमजोर नहीं कि तुम मुझे इतनी आसानी से उखाड़ फ़ेकने मे सफ़ल हो सको .यह भी हो सकता है कि अंत में तुम मुझे लील जाने में सफ़ल हो जाओ पर बिना संघर्ष के सम्र्पण कर दूं ,इतना कम्जोर मैं नहीं .उस नन्ह ेसे जीव का संघ्र्ष हमें विमुग्ध कर गया.मात्र मुग्ध ही नहीं बहुत कुछ दे गया .तुष्टि से उपजी शिथिलता ,्जिसमे कहीं शायद पलायन का भाव भी था रोज्मर्रा के जीवन की उठापटक से ,को झटक कर खड़े हो गये हम.चारो ओर द्रिष्टि घुमा कर अंदर तक उतारा द्रिश्यों को.एक बार देखा सामने धूप में चमकते मंदिरों के कलश को और फ़िर द्रिष्टि जमा दी उस सांप पर.मन मे ढेर सारी स्रद्धा भर सर झुकाया अपने प्रेरणा पुंज को और एक नये विश्वास से चल पड़े हम हाथ पकड़ कर.
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