Wednesday, January 22, 2020

गीत

भरी दोपहरिया जब देखी हमने बरगद की छाया
सच कहते हैं , साथ तुम्हारा हमको बेहद याद आया।

जलती धरती पर नंगे पैरों का सफर हो कितना भी लम्बा
रोम रोम शीतल कर जाय तेरे नेह की गंगा

भाग के आये तेरी छाया जब जब मन घबराया
साथ तुम्हारा हमको.........

बिन छत की दीवारों से होते गर न तुमको पाते
कैसे फिर करते बोलो मरू में भी पलास की बातें

इसीलिए तो कहते हैं, तुमसे है जीवन पाया
साथ तुम्हारा हमको.......

बसंत गीत 2

बसंत ने गुनगुनाया एक गीत प्रेम का


रंगों भरी गागरिया कांधे पर लादे
थिरक थिरक नाचे धरती गलियों औ चौबारे

चटका पलाश और रच गया एक गीत प्रेम का
बसंत ने.....


फूली सरसों के संग उमगे गोरी का मन
देहरी की ओट तके रतनारे नयन

महका पवन और लिख गया एक गीत प्रेम का
बसंत ने........

बसंत गीत

लोगों को बौरा जाता है, महुये का मादक रस
मुझको तो पागल करता है, फूली सरसों का आंचल।

सोंधी माटी की महक मन प्राणों पर छाती
खनकती हवा बस यादें तेरी ही लाती

गुनगुनाते खेतों की धुन पर शोग मचाती पायल
मुझको तो पागल करता..........

दूर तलक फैला बासंती वातायन
मेरे तन पर लिपटी तेरी चाहत का रंग

जलपाखी बन साधें करती हलचल
मुझको तो पागल करता है........

Sunday, December 15, 2019

पृथ्वी के छोर पर--- डा. शरदिन्दु मुखर्जी





पृथ्वी के छोर पर, डा. शरदिन्दु मुखर्जी की अंटार्कटिक यात्राओं के उनके अनुभव.....नहीं, हम इस पुस्तक की समीक्षा नहीं लिख रहे हैं। समीक्षाओं पर मेरा बहुत विश्वास भी नहीं है। मुझे लगता है, प्रत्येक पुस्तक को विभिन्न पाठक अलग अलग प्रकार से ग्रहण करते हैं और यह निर्भर करता है उनकी अपनी रूचि, अपने दृष्टिकोण, अपनी संवेदनाओं पर। तो मैं भी यहां बस यही साझा करूंगी कि मैंने इस पुस्तक से क्या पाया, इसे मैंने कैसे जिया।
डा. मुखर्जी ने अंटार्कटिका की यात्रायें एक भूवैज्ञानिक की हैसियत से की अतः पुस्तक में हमारे देश के विभिन्न अंटार्कटिका अभियान, उनसे सम्बंधित तैयारियां, प्रशिक्षण और उपलब्धियों सम्बंधी प्रचुर जानकारी है, जिनका ज्ञान हमें देश का नागरिक होने के नाते होना चाहिए, लेकिन होता नहीं है। अमूमन इस प्रकार की किसी भी विशिष्ट क्षेत्र सम्बंधी उपलब्धि के सम्बंध में हमारी जानकारी मात्र उपलब्धि की हेडलाइन तक ही सीमित रहती है किंतु इस पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने के पश्चात् मुझे लगा कि गूढ़ तकनीकी संदर्भों को छोड़ कर किसी भी अभियान के नेपथ्य में लगातार किये गये परिश्रम और तैयारी का भी हम आम नागरिकों को ज्ञान होना चाहिए। हम उस उपलब्धि का वास्तविक मूल्य तभी समझ पाने में सक्षम होंगें। इस पुस्तक का सबसे सुखद पहलू यह है कि इन समस्त
जानकारियों का उल्लेख बीच बीच में इस प्रकार किया गया है कि ये कहीं पर भी यात्रा वृत्तांत की रोचकता में बाधा नहीं उत्पन्न करती और इसका श्रेय मेरी राय में जाता है डां. शरदिन्दु के भीतर के लेखक को, जिसे हर प्रकार के पाठक को बांध लेना, उनकी रुचियों का ख्याल रखना आता है।
इस पुस्तक ने आनंदित किया मेरे भीतर के उत्सुक विद्दयार्थी को। हिम के रूप, आइस फ्लोस, शेल्फ आइस, फास्ट आइस हों या पॉलिनिया, शिर्माकर ऑएसिस, प्रियदर्शिनी झील,नुनाटक, ग्रूबर पहाड़ जैसे स्थान कल्पना के कोरे पन्ने पर जैसे जैसे चित्र आकार लेते रहते, मेरा मन उन सबके विषय में और जानने को उत्सुक होता रहता। अंटार्कटिका की यह दुनिया तो बिल्कुल अलग ही है न। वैसे भी प्रकृति वह भी निर्जन हमें हमेशा से आकर्षित करती है फिर यह परिदृश्य तो मेरी कल्पना से भी परे एक नये लोक का कपाट खोल रहे थे मेरे लिए और हमें यह भी पता था कि यह कोई कल्पना लोक नहीं मेरी अपनी धरती का ही हिस्सा है। हवा में उल्टा लटका जहाज हो या दूर दूर तक कुछ भी, कोई भी न होने के बावजूद गाड़ी की जलती लाइट, प्रकृति की जादूगरी और उनका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण, बहुत कुछ है सीखने को इस पुस्तक में।
  य़े संस्मरण हमें मनुष्य और उसके भीतर की अपार संभावनाओं के विषय में भी बहुत कुछ बताते चलते हैं। हिम आच्छादित अंटार्कटिका की बर्फीली हवाओं,जोखिम भरे परिवेश में महीनों व्यतीत करना, जहां न जाने किसने पलों में मृत्यु जैसे सामने खड़ी दिखायी दे, समय ही मात्र नहीं व्यतीत करना अपने अपने हिस्से के कर्त्तव्यों का सफलता पूर्वक निर्वहन भी करना, मनुष्य की क्षमताओं पर हमारा विश्वास बढ़ाते हैं। प्रेरणादायी हैं ये संस्मरण । एक और बात जो हमे समझ में आयी, जहाज पर समुद्री यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व हुआ सांस्कृतिक आयोजन हो या अंटार्कटिका की भूमि पर सांस्कृतिक सामूहिक आयोजन इन सबका एक विशिष्ट उद्देश्य है। उत्स्वधर्मिता मनुष्य के मनुष्य होने में समाई हुई है। उत्सव पर्वों का आयोजन मात्र व्यवहारिकता नहीं है, वह अपरिहार्य है, मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने के लिए, उसके भावानात्मक संतुलन के लिए। हम जब प्रकृति के सान्निध्य में होते हैं और वह भी अत्यंत सीमित संसाधानों में अपने को बचाये रखने का संघर्ष करते हुए तो हमारा मन, व्यक्तित्व अपने सर्वाधिक सुंदरतम स्वरूप में होता है, निर्मल और पावन।  भौगोलिक सीमाओं से परे बस मनुष्य हो मनुष्य से जुड़ना, विपत्ति में एक दूसरे के काम आना, ऐसे ही कितने उद्धरण हैं इस पुस्तक में जिनसे गुजरते समय मेरा मन एक अवर्चनीय सुख से भर उठता था।
 और इन सबके साथ है, समुद्री यात्रा से ले कर अंटार्कटिका की भूमि तक के मनोहारी प्राकृतिक दृश्यों का शरदिन्दु जी द्वारा वर्णन। खुला खुला दूर दूर तक फैला नीला, हरा सागर, सागर में तिरते छोटे -बड़े अनगिनित ग्लेशियर, द्वीप, दूर तक फैली बर्फ की चादर, पक्षी, चमकती भोरें, धवल ज्योत्सनामयी रातें, बर्फ पर सूरज की चित्रकारी, ऐसे विलक्षण और अनुपम दृश्यों का वर्णन है कि मैं कब बाहर की यात्रा से विलग हो भीतर की यात्रा पर चल पड़ती पढ़ते पढ़ते मुझे खुद ही नहीं पता चलता।
गरज यह कि आपकी रुचि कुछ भी हो, भौगोलिक, वैज्ञानिक तथ्यों की, प्रकृति के बिलकुल ही अलग विलक्षण दृश्यों की, मानव मन एवं मानव प्रकृति के प्रेरणादायी प्रसंगों की, पृथ्वी के छोर सच में आपको एक अलग ही तरह के अनुभवों से गुजरने का अवसर प्रदान करती हैं।






Tuesday, September 24, 2019

निर्मल वर्मा के बहाने एक याद


''नहीं जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहां आदमी टिक कर रहे- तभी तो घरों के नाम होते हैं, या फिर कब्रों के।" निर्मल वर्मा, 'कव्वे और काला पानी' से।
लेकिन घर भी मकान हो जाते हैं और फिर बहुत धीरे धीरे तब्दील हो जाते हैं खंडहरों में, भीतर बाहर सब और नाम बेसबब सा खुदा रह जाता है। कई बरस पहले की याद चमक गयी मन में जब हमने कब्रों को घर होते देखा था। नहीं , चले गये लोगों का तो घर होती ही हैं कब्रें। हमने तो उन्हें जिंदगी से सराबोर घरों में तब्दील होते देखा है।


उन दिनों हमारी पोस्टिंग आगरा में थी और हमने एक नयी बनती , बसती कॉलोनी में घर लिया था। रिक्शे से बैंक आते जाते रास्ते में एक बहुत बड़ी मैदान सी जगह में कुछ कच्ची- पक्की कब्रें बिखरी हुई थीं। काफी बड़े- बड़े छायादार पेड़ भी थे बीच बीच में। कोई बाउंड्री न होने के कारण सब कुछ साफ दिखता था। पैदल आने -जाने की पगडंडियां भी बन गयीं थीं और कुछ घुमंतु प्रजाति के लोग जो जगह जगह तम्बू लगा कर रहते थे और अपने अपने हुनर के हिसाब से काम भी करते थे , वे भी अक्सर अपने तम्बू बीच की खाली जगहो में लगा लिया करते थे। इसमें छोटे स्तर पर मिट्टी के खिलौने बनाने वाले होते थे, साइकिल के पहिए के बीच में लगने वाले हरे, लाल, पीले रंगों के ब्रश के बाल जैसे सजावटी सामान बनाने वाले होते थे और भी उन दिनों प्रचलित बर्तन में कलई, जड़ी बूटी, नट आदि किस्म किस्म के काम करने वाले लोग रहते थे। जिंदगी अपनी पूरी रौ में बहती थी। कुछ कब्रें साबुत थी, पक्की, चार खम्बों , पक्की छत और ऊंचे चबूतरे वाली। इन्हीं में से किसी में कभी- कभी बँधा रहता था धोती से बनाया गया पालना और आराम से सोता था नवजात शिशु। उसकी मां भी जैसे निश्चिंत हो जाती थी उसे किसी बुजुर्ग के साये में सौंप और करती रहती थी अपने काम काज, कभी घन चलाना, कभी टिक्कड़ सेंकना। माटी के नीचे जो भी होगा, अच्छी लगती होंगी न उसे भी उगती जिंदगी नरम- गरम सांसें। अक्सर देखा था, अंधियारा घिर जाने के बाद, वहीं पास चूल्हे की आग सुलगती थी, अम्मा को घेर बच्चे बैठे रोटी खा रहे होते, तो कब्र के सिहराने जल रहा होता एक दिया। कितनी अच्छी रीत थी न, जलाने वाली को नहीं मालूम होता था कौन था, कब चला गया था, कैसे गया था, उसे तो इतना मालूम था कि इनकी छत तले उसके बच्चे बारिश होने पर भीगते नहीं थे, जेठ के ताप से भी बचते थे और पूस की रात आसमान से झरती ठंड से भी। सो जोत जगाये रखना तो उसका धर्म बनता था न।
मृत्यु की ऐसी निस्संग स्वीकृति, जीवन और मृत्यु का यूं हाथ थामे चलना कैसी तो आश्वस्ति देता है मन को।

पेड़ के तने पर खोद कर, ऐतिहासिक इमारतों में जहां तहां उकेर कर, चट्टानों पर लिख कर या फिर घर और कब्र पर ही लिख कर नाम, भला कौन सी अमिट छाप छोड़ पाने का मोह पाले रहते हैं हम। शाश्वत तो जीवन तभी होता है जब वह खुद को मृत्यु का ही एक हिस्सा मान लेता है।



छाया, सुंदर अय्यर




Thursday, July 4, 2019















आगमन पत्रिका के अप्रैल- जून 2019 अंक में प्रकाशित आलेख - सासों पर सांकलें चढ़ा कर जीने की मजबूरियां


Monday, June 10, 2019

मेंढक मंदिर

जबसे सुना था इस मंदिर के बारे में जाने की बड़ी इच्छा थी पर साइत आते आते बरस बीत गए। हालांकि बताने वाली बहुत कुछ नहीं बता पायी थी पर हमारी कल्पना तो उतने से ही उछाल मारने लगी थी जित्ता जरा सा सुना था। और जाना भी हुआ तो कब, जून की भद्दर दोपहरिया में, पर सोच लिया था कि जाना तो है ही।
सड़कें अच्छी बन गयीं हैं सो यात्रा में कोई परेशानी नहीं हुई। रास्ते में  रुके चाय पीने झरेखापुर की एक दुकान पर,  तिराहे के पास। तबियत खुश हो गयी बालक की बनाई चाय पी कर। भाई लोगों ने समोसा भी खाया और बहुत पसंद भी किया । उसी दुकान पर मिले एक सज्जन ने हरगांव के प्राचीन मंदिर की भी जानकारी दी और कहा जब यहां तक आये हैं तो लौटते में वहां भी हो लीजियेगा।
खैर, हम पहुंचे ओइल के मंदिर और सच मानिये, जीना चढ़ जैसे ही दरवाजे में घुसे कि कुछ पल तो अचम्भित खड़े रह गये। यह मंदिर अपने आप में हमारे शहर या प्रदेश में ही नहीं देश में भी अनूठा है।
मंदिर का निर्माण राय बख्त सिंह जो उस समय इलाके जमींदार थे, ने करवाया था। राय बख्त सिंह जी का देहांत 1838 में हो गया था । राय बख्त सिंह जी के वंशज अनिरुद्ध सिंह जी को 1849 में अवध के बादशाह द्वारा राजा की उपाधि प्रदान की गयी, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने वंशानुगत मान्यता प्रदान कर दी। आज भी वर्तमान
राजा विष्णु नारायण दत्त जी की कोठी ओइल में है और राजा एवं रानी साहिबा वहां अक्सर आते हैं। रंजीत के अनुसार राजा तो भोले शंकर हैं, अपने आप में रहते हैं पर रानी साहिबा को मंदिर के बाग की एक एक पत्ती की जानकारी है। खड़े हो के, भले ही धूप हो कि बरखा खुद ही निश्चित करती हैं कि कौन पौधा कहां लगेगा और किसे क्या तथा कितनी खाद दी जायेगी। जितने गर्व और प्रेम से वह रानी साहिबा के बारे में बात कर रहा था, साफ पता चल रहा था कि राजा- रानी अत्यंत लोकप्रिय हैं और गांव के लोगों के करीब भी।
हां तो बात मंदिर की हो रही थी। राय बख्श सिंह जी ने यह मंदिर एक तांत्रिक के संरक्षण में बनवाया था। मंदिर की संरचना, दीवारों पर उकेरी गयी आकृतियों को देख साफ पता चलता है कि यह मंदिर सामान्य से हट कर है। कुछ लोगों का कहना है कि अपनी प्रजा की भलाई के लिए यह मंदिर बनवाया गया था जिससे कि इलाके के लोग हमेशा धन-धान्य से परिपूर्ण रहें। कुछ लोगों का मानना था कि उन दिनों इलाका भंयकर सूखे की चपेट में था और मेघालय के इस कापालिक तांत्रिक के कहने पर वर्षा की कामना से मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया गया था। पता नहीं वास्तविक कारण क्या था। कापालिक तांत्रिक के संरक्षण में मंदिर निर्माण थोड़ा सामान्य से हट कर तो है पर इसीलिए तो हमें अपने क्षेत्र में इतना असाधारण मंदिर प्राप्त हो सका।
मंदिर के मुख्य आराध्य शंकर भगवान हैं। ऐसा कहा जाता है कि तांत्रिक के कहने पर ही राय बख्त सिंह जी मां नर्मदा में स्नान करने गये थे, जहां स्नान करते समय  तांत्रिक के कहे अनुसार उन्हें धारा में ही यह शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसी कारण इस मंदिर में स्थापित शिव जी नर्मदेश्वर महादेव के नाम से जाने जाते हैं।
 अब आइये बात करते हैं मंदिर की संरचना की। सम्पूर्ण मंदिर एक मेंढक की पीठ पर बना है। इस मंदिर को मंडूक मंदिर या मेंढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की संरचना तांत्रिक यंत्र पर आधारित है। मंदिर जमीन से तकरीबन 100 फीट की ऊंचाई पर है। सबसे नीचे मेंढक का आकार है जिसका मुख सामने की और और पिछला हिस्सा मंदिर के पीछे की और साफ साफ देखा जा सकता है. मेढक की आकृति के पैर दोनों ओर निकले हुए हैं। मेढक पर सीढ़ीयां यज्ञ की वेदी के आकार में बनी हैं । नीचे वाली तीन स्तर पर बनी सीढ़ीयां सत्व, रज और सम, प्रकृति के तीन मूल भूत तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। कहा जाता है हमारे पंच मूल भूत तत्व भी इन्हीं सूक्ष्म तत्वों से बने हैं। इनके ऊपर आठ और फिर सोलह दलों के कमल हों जैसे ,ऐसी आकृति है और उसके ऊपर मंदिर स्थापित है।
मेढक के चारों पैरों के पास दोमंजिला बुर्ज से बने हैं. इन सबकी बाहिरी दीवारों पर भी मुख्य मंदिर की भांति देवी, देवताओं, चौसठ योगिनियों के तथा अन्य बहुत से चित्र उकेरे हुए हैं । इन बुर्जों के भीतर जाने वाले दरवाजे पर ताला पड़ा था। यद्दपि बाहर से दूसरी मंजिल के भीतर बने रंगीन भित्ति चित्रों की झलक मिलती है ।
मंदिर के गर्भ गृह में घुसने के लिए बहुत छोटा सा दरवाजा है। झुक कर ही भीतर जाया जा सकता है। ठीक भी है, ईश्वर के समक्ष नत होना ही चाहिए। गर्भ गृह में बीच में करीब तीन फीट ऊंची सफेद संगमरमर की वेदी पर काले रंग के शिवलिंग स्थापित हैं  और मंदिर की एक और विशेषता भी गर्भगृह में देखने को मिलती है। यहां शंकर भगवान के अनन्य भक्त नंदी महाराज खड़े हैं। धीरज की प्रतिमूर्ति शांत मना नंदी यहां बिल्कुल अलग स्वरूप में हैं। कदम आगे - पीछे महाराज कुछ आतुर से दिखते हैं। मंदिर की छत के चंदोवे में रंगीन चित्रकारी है। नंदी महाराज भी सफेद संगमरमर के ही बने हैं। गर्भ गृह में एक तरफ बड़ा सा घंटा लगा है और उसके पीछे एक छोटा दरवाजा है जो कि बंद रहता है। मंदिर में उस समय पूजा कर रहे एक स्थानीय सज्जन ने बताया कि बहुत पहले राज घराने की महिलायें इसी दरवाजे से भीतर ही भीतर पूजा करने आती थी ऐसा कहा जाता है।
गर्भ गृह में प्रविष्ट होने वाले दरवाजे के सामने एक कुंआ है। इतनी ऊंचाई पर कूुंआ, सच अद्भुत । कुंए में पानी भी था और निकल भी रहा था। जमीन के स्तर पर पानी दिख भी रहा था. कहते हैं इसका पानी कभी नहीं सूखता। पानी से ध्यान आया कि जिन मेंढक महाराज की पीठ पर यह मंदिर बना है, उनका मुख खुला है और ऊपर सीढ़ीयों के जोड़ पर एक लाइन में कुछ ऐसे छेद बने हैं कि लगता है जैसे यब प्रबंध किया गया होगा कि जब शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाय तो वह अंत में मेंढक के मुंह से बाहर निकले।

मंदिर परिसर में चारों ओर काफी खुली जमीन है। एक तरफ कुंआ और हैंड पम्प हैं, पेड़ पौधे हैं और बहुत सारे बेल के पेड़ हैं। मंदिर की बाउंड्री की दीवार से लगे बाहर की ओर चारों तरफ ठाकुर द्वारे हैं। पहले कभी इनके दरवाजे मंदिर की ओर खुलते थे पर अब बंद हैं।
मंदिर के शिखर पर पीतल के कलश हैं । कलश पर चारों ओर गौ माता के मुख बने हैं। बताया जाता है कि एकदम शिखर पर कभी पूरा 'ऊं' लिखा था जो अब टूट कर आधा रह गया है।
 मंदिर की दीवारों पर बनी आकृतियों मेंऔर भी बहुत कुछ था जो हम पूरी तरह समझ नहीं पाये । कुछ ऐसा भी कहा जाता है मंदिर के विषय में जो हम देख नहीं पाये। कहते हैं कि सूरज की किरणों के बदलते कोणों के संग शिव लिंग भी रंग बदलता है। यह भी सुना कि पहले मंदिर की छत सूरज के घूमने के साथ साथ घूमती दिखायी देती थी पर  समय और प्रक़ृति की मार ने कुछ ऐसी क्षति कर दी है कि अब ऐसा नहीं होता है।
संरचना ही नहीं यह मंदिर मन में बहुत अलग सी अनुभूति भी जगाता है। गर्भगृह के भीतर सब कुछ शांत हो जाता है। बाहर बैठो तो मन जैसे भागता है पीछे की ओर जानने को बहुत कुछ --- कैसा रहा होगा वह समय, कौन होंगे वे लोग जिन्होंने निर्माण किया होगा मंदिर का। कौन थे वे तांत्रिक, यदि सच में थे तो। नहीं थे तो किसने सुझाया होगा यह अलग सा मंदिर बनाने को। यह भी सुनने में आया कि मंदिर निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। चारों ओर बनी बुर्जियों में एक एक में गणेश जी, कार्तिकेय जी, आदि की स्थापना होनी थी पर तांत्रिक महाराज की पूजा में कोई बाधा पड़ जाने से वह संभव नहीं हो पाया,  इसीलिए वे खाली पड़ी हैं और प्रवेश निषेध है।
न जाने कितनी कहानियां, कितनी कथायें समेटे है अपने में यह मंदिर, पर सच नायाब है। अघाया नहीं हमारा मन। एक बार और जाना है और वह भी ज्यादा समय के लिए।
पता चला शिवरात्रि, दीपावली आदि में काफी बड़ा मेला लगता है यहां। बहुत भीड़ होती है ।उस समय कुछ अलग दृश्य रहता होगा ।
वैसे तो हम जब गए समय सही था। न ही भीड़ ज्यादा थी, न आपा धापी। बिल्कुल सुनसान भी नहीं था। क्षेत्रीय लोगों की आवाजाही थी ,जो काफी समय लगा कर विधि विधान से पूजा कर रहे थे। कुछ जोड़े बस यूं ही घूमने आये थे।  कुछ अन्य प्रांतों के पर्यटक भी थे। एक बड़ा पारिवारिक समूह था, मराठी बोलता हुआ।
देखे फिर कब बुलाते हैं भोले बाबा, पर बुलाना जरूर.......................


































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