Tuesday, March 28, 2017

पर्यटक की डायरी...














ये बूंदी के डाभाई कुंड के चित्र हैं। कितना सुंदर और कलात्मक है ना डाभाई कुंड ?  आप सब बूंदी निवासी, कुंड के आसपास रहने वाले और वे पर्यटक भी जो निकट भविष्य में डाभाई कुंड गए हैं थोड़े आश्चर्य में तो जरूर होंगे कि कितना स्वप्निल आभास दे रहा हैं ये कुंड। हां ये सच है कि इन चित्रों में उभरती तस्वीर से बहुत ही अलग और दुखद अनुभव है डाभाई कुंड से सीधा साक्षात्कार करने का। नहीं नहीं, कुंड की कलात्मकता, उसके स्थापत्य और उसके सौंदर्य में कहीं कोई कमी नहीं है। वो सब बिलकुल वैसा ही है जैसा कि चित्रों में दिख रहा है। लेकिन हां, बहुत दुखी है ये कुंड अपनी उपेक्षा और अपने प्रति किए गए दुर्व्यवहार से।
जनवरी 2017 में अपनी बूंदी यात्रा के दौरान हमने बूंदी के अनेक कुंड देखे। हमने पढ़ रखा था कि पर्यटन की दृष्टि से रानी जी की बावली सर्वोत्तम कुंड है बूंदी का। किंतु हमारी यात्रा के समय इस बावली में संरक्षण कार्य चल रहा था और प्रवेश वर्जित था इसलिए हम उसके सौंदर्य का आनंद उठाने से वंचित रह गए। सच पूछिए तो डाभाई कुंड भी अत्यंत कलात्मक और खूबसूरत है, फिर इसकी ऐसी दुर्दशा क्यों ? आप देख रहे हैं चित्रों में हम कुंड की सीढ़ियों में कुछ दूर उतरे, वहां कुछ देर बैठे भी, आश्चर्य हो रहा है ना कि जैसी कुंड की अवस्था है इस समय, कोई भी पर्यटक कैसे वहां जा कर बैठ सकता है। लेकिन शायद उस कुंड ने हमसे केवल अपनी व्यथा ही नहीं कही बल्कि एक सपना भी दिखाया। साफ सुथरी सीढ़ियों वाला चमकता कुंड, सीढ़ियों पर लाल, नीली, हरी, पीली बंधेज, लहरिया साड़ियों में लिपटी सतरंगी चुनरियां लहराती राजस्थानी महिलाएं कुंड के चौड़े चबूतरे पर लोक गीत और लोक नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही हैं, बहुत सारे पर्यटक इधर उधर बैठे राजस्थान की संपन्न सांस्कृतिक विरासत का आनंद उठा रहे हैं या फिर किसी क्षेत्रीय पर्व या आयोजन के अवसर पर कुंड की कलात्मकता का उपयोग हो रहा है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुंड के रखरखाव के लिए जिस राशि की आवश्यकता हो उसके लिए प्रवेश पर कोई शुल्क लगा दिया जाए या फिर पर्यटन विभाग या स्थानीय प्रशासन पत्थरों से लिखी इन खूबसूरत इबारतों को एक निर्धारित शुल्क लेकर प्री-वेडिंग या ग्लैमर शूट जैसे अवसरों के लिए इस्तेमाल करे।
जब जाड़े की उस सुबह उगते सूरज की हल्की मीठी धूप में हम उन सीढ़ियों पर बैठे थे तो सच मानिए मन खुशी और विषाद के मिश्रित भावों से भरा था। लेकिन जब कुंड के परिसर में बने शंकर भगवान के मंदिर में हाथ जोड़े खड़े थे तो पता नहीं क्यों मन में यह भाव आए कि अपनी यह बात आप सब तक पहुंचाएं। देखिए हमने तो अपना सपना साझा कर दिया आपके साथ, इस उम्मीद के साथ कि इसे पूरा करने के दिशा में आप सब जरूर कुछ न कुछ करेंगे और हमें एक बार फिर डाभाई कुंड आने का न्योता देंगे। 


चित्र --- सुंदर अय्यर.

Wednesday, February 22, 2017

देहरी पर हक



उस दिन किसी ऑफीशियल कार्य से अपने गांव के पास के कस्बे में जाना हुआ तो  अचानक मेरा मन किया कि एक चक्कर गांव का भी लगा लें। यूं तो करीब तीस पैंतीस साल का समय बीत चुका था मुझे गांव छोड़े, बहुत कुछ बदल गया था आसपास, जीवन भी किसी और दिशा में बह निकला था, पर पता नहीं क्या था कि उस दिन गांव बहुत खींच रहा था। सरसों फूलने के दिन थे तो मैं पैदल ही खेतों के बीच की पगडंडी पर चली जा रही थी बीते हुए बचपन और किशोरावस्था को मन ही मन जीती। न जाने कहां-कहां से स्मृतियां बंद किवाड़े खोल भागी चली आ रही थीं। अब यूं तो गांव से कोई भी रिश्ता नहीं रहा था हम लोगों का, न घर दुआर, जमीन, न बाग बगीचे लेकिन फिर भी माटी का जुड़ाव शायद इतनी आसानी से नहीं जाता।

गांव की शुरुआत पर ही पीपल के पेड़ के नीचे बैठी मटमैली धोती में लिपटी एक आकृति दिखाई पड़ी। पास पहुंच कर देखा तो पहचान लिया, ये बृजरानी बुआ थीं। उनकी धुंधलाती आंखें मुझे नहीं पहचान सकी थीं पर हमारी यादों में उनकी सुनाई कहानियों के साथ साथ वो भी संपूर्ण रूप से जीवित थी। परिचय देने पर उनके चेहरे पर अजीब सी ललक और खुशी पसर गई। 
मैंने पूछा, ''बुआ यहां अकेले गांव बाहर क्यों बैठी हो !'' 
पेड़ के नीचे सिंदूर में लिपटे भगवान की ओर इशारा करते हुए बोलीं, ''बिटिया, अब यहीं ठिया है और यही आसरा।'' 
बृजरानी बुआ अपने पति की मृत्यु के बाद बहुत छोटी अवस्था में ही अपने मायके वापस आ गई थीं। और चार भाइयों की इकलौती बहन को भाभियों समेत पूरे परिवार ने, परिवार क्या समूचे गांव ने भरपूर लाड़ से संभाला था। बुआ थीं भी ऐसी कि जरूरत किसी की भी हो, कैसी भी हो, एक पांव से पूरे गांव में चकरघिन्नी की तरह घूमती रहती थी। सब के काम आने वाली, सबके दुख दर्द साझा करने वाली बुआ ने घरों में ही नहीं लोगों के दिलों में भी अपनी जगह बना ली थी।
लेकिन समय कब एक सा रहता है, पुराने गए, नए आए, बुआ भी शारीरिक रूप से अशक्त हो गई थीं। यूं जब तक उनके हाथ पैर चलते रहे न उन्होंने कभी अपनी देहरी की कमी महसूस की न जमीन की। पर आज जीवन के इस पड़ाव पर वे कितनी निस्सहाय बैठी थीं।
बुआ से बातें ही कर रहे थे कि करीब उन्नीस बीस साल की एक लड़की साइकिल चलाते हुए आई और रुक गई। उसने मेरी तरफ एक प्रश्नवाचक निगाह डाली और बुआ से बोली, ''कुछ मिला है खाने को सवेरे से?'' 
 उनके कुछ कहने से पहले ही दो मिठाई के टुकड़े अपने झोले से निकाल उनके सामने बढ़ा दिए। ये सरोज थी, गांव की ही एक लड़की जो पास के डिग्री कॉलेज में पढ़ने जाती थी। उसका चेहरा बुआ की बातें बताते-बताते आक्रोश से तमतमा गया था। 
वो बोली, ''अभी अगर दादी के नाम घर जमीन या बाग बगीचा होता तो सब इनको पूछते।'' 
तब तक आसपास और भी गांव की दो चार महिलाएं आ जुटी थीं। उनमें से एक बोली, ''धत् पगलिया, लड़कियों के नाम कहीं जमीन जायदाद होती है।'' 
सरोज बोली, ''हो सकती है और होनी चाहिए भी, हमारे कॉलेज में पिछले हफ्ते एक संस्था से लोग आए थे, उन्होंने बताया था कि माता-पिता की हर संपत्ति पर लड़कियों का भी उतना ही अधिकार होता है जितना कि लड़कों का।'' 
लेकिन ये बात वहां किसी के गले के नीचे नहीं उतर रही थी। उनका सोचना था कि लड़की को तो ब्याह कर दूसरी जगह जाना होता है तो मायके की संपत्ति में उनका कैसा हिस्सा।
पर इन सब से अलग थी बुआ के मन की पीड़ा, उन्होंने तो ताउम्र घर दहलीज की कमी महसूस ही नहीं की थी। उनका कहना था कि घर जमीन होने से अगर चार लोग दरवाजे पर जुटे भी रहते तो क्या उससे मन का सुख मिल जाता? सरोज की सोच इसके बिलकुल इतर थी, उसका कहना था, जरूरतें तो पूरी होतीं और गांठ मजबूत हो तो सम्मान मिल ही जाता है। और मैं सोच रही थी कि दो पीढ़ियों के बीच के इस वैचारिक और भावनात्मक अंतर पर कैसे एक पुल रचा जाए।
बिलकुल सही है सरोज कि स्त्री को समान अधिकार, हक दिलाने के लिए कानून हैं, विभिन्न स्तरों पर उसका शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक उत्पीड़न रोकने के लिए भी स्पष्ट कानून हैं किंतु क्या मात्र कानून बना लेने से सारी समस्याएं हल हो जाती हैं। यह सच है कि कानून पक्ष को मजबूती देता है, नियम कानून की जानकारी अपने हक की बात दूसरों के सम्मुख रखने में सक्षम बनाता है। अधिकारों की लड़ाई लड़ने में कानून हथियार का काम करता है। किंतु सुधार के लिए मात्र कानून का बनना या उसकी जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं है। सामजिक रूप से सच्चे अर्थों में स्त्री की स्थिति के सुधार के लिए आवश्यक है हमारे दृष्टिकोण एवं सोच में बदलाव। समाज के हर तबके को जब यह सहर्ष स्वीकार्य होगा कि स्त्री बेटी हो पत्नी हो, मायका हो या ससुराल हर देहरी पर उसका अपना भी एक हक है। उसका अस्तित्व, उसकी भागीदारी समान है। तभी सच्चे अर्थों में परिवर्तन संभव है। इसीलिए कानूनी जानकारी देने के साथ-साथ आवश्यक है कि सोच में बदलाव के लिए जमीनी स्तर पर काम किया जाए। 
और सोच बदलेगी, नजरिया बदलेगा तो न किसी बृजरानी बुआ का ठिया गांव बाहर के पीपल का चबूतरा होगा, न किसी सरोज के भीतर की असुरक्षा आक्रोश बन फूटेगी। बुआ के कंपकंपाते सुर के साथ जब सरोज की सपनों से लबरेज आवाज बासन्ती खेतों पर लहरायेगी, धरती की छाती तो तभी जुड़ायेगी।

Saturday, August 27, 2016

27.06.05

बारिश में भीगे दिन की शुरुआत. शहर अभी भी अजनबी है.अपने घर के खिड़की दरवाजे आवाज देते हैं.बारिश में धुल पुछ कर निखर आतीं थीं मेरे अमलतास की पत्तियां.

Friday, August 26, 2016

कुछ फुटकर लिखा पढ़ी



आज यूं ही अलमारी की सफाई करते हुए कुछ फुटकर कागज हाथ लगे जिन पर कभी कुछ लिखा था. हमें याद भी नहीं था.सोचा उसे यहां दर्ज कर लिया जाय.......

11.01.04
डूबते हुए सूरज को पोर -पोर अदृश्य होते देखना अपने आप  में एक ऐतहासिक अनुभव है.
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डूबते सूरज के हर पीछे छूटते कदम के साथ आकाश के सीने में हलचल बढ़ने लगती है.

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अस्त होता सूरज हमें हमेशा किसी वीर योद्धा सा लगता है. अपने कांधे पर दूसरों की लड़ाइयां लादे, अनवरत संघर्षरत जो हर सांझ किसी घायल शेर सा अपने कर्म क्षेत्र की रण भूमि पर आहिस्ता -आहिस्ता अपना शरीर ढीला छोड़ देता है.आकाश उसे अपनी बांहों में समेट अपने आंचल तले दुबका लेता है. यह नेह, यह आश्वस्ति उसे एक नयी स्फूर्ति से भर देते हैं और अगले रोज वह फिर ताजा दम हो निकल पड़ता है एक और नयी लड़ाई जीतने. कुछ और अंधियारे कोनों से बतियाने.
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 एक सूर्यास्त तो वर्षों बाद आज भी मेरे स्मृति पटल पर ताजा है. मेरी उम्र उस समय यही कोई दस ग्यारह वर्ष की होगी. गर्मियों की छुट्टियों में हम गांव गए हुए थे.एक दिन चाची, भाभी, बुआ लोगों की टोली के साथ हम भी आम के बागीचे की सैर को गए थे.मई -जून के महीने थे. खेत खलिहानों में बदल गए थे. दूर- दूर तक फैले मटमैली मिट्टी के मैदान के बीच में जहां -तहां कटे अनाज, भूसे और दानों के ढेर नगे थे. कहीं दूर सांझ के धुंधलके में आम के झुरमुट की गहराती छाया खाली खेतों के विस्तार को विराम दे रही थी. ज्यादा चलने की आदत न होने के कारण मैं थक कर एक खेत की मेड़ पर बैठ चारों ओर देख रही  थी. गहराती शाम का मायावी संसार और चारों ओर पसरा सन्नाटा.... एक सम्मोहन सा छा रहा था. सारी शैतानी और चुलबुलाहट भूल मैं बिल्कुल शांत बैठी थी.तभी मेरी घूमती नजर सामने सूरज के गोले पर जा टिकी.बहुत बड़ी परात जितना सिंदूरी गोल सूरज..दूर इतना नीचे लग रहा था जैसे खेत की मेंड़ पर टिका हुआ हो. धरती पर सूरज ...वह भी इत्ता बड़ा कि मैं अपनी नन्हीं- नन्हीं दोनों बाहें फैला कर भी इस सिरे से उस सिरे तक नाप न सकूं. विस्मय से विमुग्घ तक ना जाने कितने भाव भर रहे थे मन में. मुझे लग रहा था सूरज के उस पार कोई जादुई संसार है. मैं बाहें फैला दौड़ कर वहां पहुंचूगी तो खुल जा सिम सिम  सी कोई खिड़की खुलेगी और मेरे सामने होगी कोई अनोखी , नयी सी दुनिया. बगीचे में कूकती कोयल की आवाजें और भाभियों की दबी दबी खिलखिलाहटे मुझे सुनायी देना बंद हो गयी थी. विश्लेषण की समझ तो थी नहीं पर विराट के सम्मुख मन कौतुहल और आदर से भर उठा था. शायद सूरज मेरे लिए ही जमीन पर उतरा है. किसी नन्हीं राजकुमारी सी मैं उसकी डोली में बैठूं तो वह आहिस्ता -आहिस्ता ऊपर उठता जाएगा. लाल पीले सिंदूरी रंगों की झलर -मलर के बीच से कैसे लगेगें ये खलिहान, ये बगीचे. यह सूर्यास्त से मेरा पहला सीधा साक्षात्कार था.

Saturday, December 12, 2015