Thursday, July 4, 2019
Monday, June 10, 2019
मेंढक मंदिर
जबसे सुना था इस मंदिर के बारे में जाने की बड़ी इच्छा थी पर साइत आते आते बरस बीत गए। हालांकि बताने वाली बहुत कुछ नहीं बता पायी थी पर हमारी कल्पना तो उतने से ही उछाल मारने लगी थी जित्ता जरा सा सुना था। और जाना भी हुआ तो कब, जून की भद्दर दोपहरिया में, पर सोच लिया था कि जाना तो है ही।
सड़कें अच्छी बन गयीं हैं सो यात्रा में कोई परेशानी नहीं हुई। रास्ते में रुके चाय पीने झरेखापुर की एक दुकान पर, तिराहे के पास। तबियत खुश हो गयी बालक की बनाई चाय पी कर। भाई लोगों ने समोसा भी खाया और बहुत पसंद भी किया । उसी दुकान पर मिले एक सज्जन ने हरगांव के प्राचीन मंदिर की भी जानकारी दी और कहा जब यहां तक आये हैं तो लौटते में वहां भी हो लीजियेगा।
खैर, हम पहुंचे ओइल के मंदिर और सच मानिये, जीना चढ़ जैसे ही दरवाजे में घुसे कि कुछ पल तो अचम्भित खड़े रह गये। यह मंदिर अपने आप में हमारे शहर या प्रदेश में ही नहीं देश में भी अनूठा है।
मंदिर का निर्माण राय बख्त सिंह जो उस समय इलाके जमींदार थे, ने करवाया था। राय बख्त सिंह जी का देहांत 1838 में हो गया था । राय बख्त सिंह जी के वंशज अनिरुद्ध सिंह जी को 1849 में अवध के बादशाह द्वारा राजा की उपाधि प्रदान की गयी, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने वंशानुगत मान्यता प्रदान कर दी। आज भी वर्तमान
राजा विष्णु नारायण दत्त जी की कोठी ओइल में है और राजा एवं रानी साहिबा वहां अक्सर आते हैं। रंजीत के अनुसार राजा तो भोले शंकर हैं, अपने आप में रहते हैं पर रानी साहिबा को मंदिर के बाग की एक एक पत्ती की जानकारी है। खड़े हो के, भले ही धूप हो कि बरखा खुद ही निश्चित करती हैं कि कौन पौधा कहां लगेगा और किसे क्या तथा कितनी खाद दी जायेगी। जितने गर्व और प्रेम से वह रानी साहिबा के बारे में बात कर रहा था, साफ पता चल रहा था कि राजा- रानी अत्यंत लोकप्रिय हैं और गांव के लोगों के करीब भी।
हां तो बात मंदिर की हो रही थी। राय बख्श सिंह जी ने यह मंदिर एक तांत्रिक के संरक्षण में बनवाया था। मंदिर की संरचना, दीवारों पर उकेरी गयी आकृतियों को देख साफ पता चलता है कि यह मंदिर सामान्य से हट कर है। कुछ लोगों का कहना है कि अपनी प्रजा की भलाई के लिए यह मंदिर बनवाया गया था जिससे कि इलाके के लोग हमेशा धन-धान्य से परिपूर्ण रहें। कुछ लोगों का मानना था कि उन दिनों इलाका भंयकर सूखे की चपेट में था और मेघालय के इस कापालिक तांत्रिक के कहने पर वर्षा की कामना से मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया गया था। पता नहीं वास्तविक कारण क्या था। कापालिक तांत्रिक के संरक्षण में मंदिर निर्माण थोड़ा सामान्य से हट कर तो है पर इसीलिए तो हमें अपने क्षेत्र में इतना असाधारण मंदिर प्राप्त हो सका।
मंदिर के मुख्य आराध्य शंकर भगवान हैं। ऐसा कहा जाता है कि तांत्रिक के कहने पर ही राय बख्त सिंह जी मां नर्मदा में स्नान करने गये थे, जहां स्नान करते समय तांत्रिक के कहे अनुसार उन्हें धारा में ही यह शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसी कारण इस मंदिर में स्थापित शिव जी नर्मदेश्वर महादेव के नाम से जाने जाते हैं।
अब आइये बात करते हैं मंदिर की संरचना की। सम्पूर्ण मंदिर एक मेंढक की पीठ पर बना है। इस मंदिर को मंडूक मंदिर या मेंढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की संरचना तांत्रिक यंत्र पर आधारित है। मंदिर जमीन से तकरीबन 100 फीट की ऊंचाई पर है। सबसे नीचे मेंढक का आकार है जिसका मुख सामने की और और पिछला हिस्सा मंदिर के पीछे की और साफ साफ देखा जा सकता है. मेढक की आकृति के पैर दोनों ओर निकले हुए हैं। मेढक पर सीढ़ीयां यज्ञ की वेदी के आकार में बनी हैं । नीचे वाली तीन स्तर पर बनी सीढ़ीयां सत्व, रज और सम, प्रकृति के तीन मूल भूत तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। कहा जाता है हमारे पंच मूल भूत तत्व भी इन्हीं सूक्ष्म तत्वों से बने हैं। इनके ऊपर आठ और फिर सोलह दलों के कमल हों जैसे ,ऐसी आकृति है और उसके ऊपर मंदिर स्थापित है।
मेढक के चारों पैरों के पास दोमंजिला बुर्ज से बने हैं. इन सबकी बाहिरी दीवारों पर भी मुख्य मंदिर की भांति देवी, देवताओं, चौसठ योगिनियों के तथा अन्य बहुत से चित्र उकेरे हुए हैं । इन बुर्जों के भीतर जाने वाले दरवाजे पर ताला पड़ा था। यद्दपि बाहर से दूसरी मंजिल के भीतर बने रंगीन भित्ति चित्रों की झलक मिलती है ।
मंदिर के गर्भ गृह में घुसने के लिए बहुत छोटा सा दरवाजा है। झुक कर ही भीतर जाया जा सकता है। ठीक भी है, ईश्वर के समक्ष नत होना ही चाहिए। गर्भ गृह में बीच में करीब तीन फीट ऊंची सफेद संगमरमर की वेदी पर काले रंग के शिवलिंग स्थापित हैं और मंदिर की एक और विशेषता भी गर्भगृह में देखने को मिलती है। यहां शंकर भगवान के अनन्य भक्त नंदी महाराज खड़े हैं। धीरज की प्रतिमूर्ति शांत मना नंदी यहां बिल्कुल अलग स्वरूप में हैं। कदम आगे - पीछे महाराज कुछ आतुर से दिखते हैं। मंदिर की छत के चंदोवे में रंगीन चित्रकारी है। नंदी महाराज भी सफेद संगमरमर के ही बने हैं। गर्भ गृह में एक तरफ बड़ा सा घंटा लगा है और उसके पीछे एक छोटा दरवाजा है जो कि बंद रहता है। मंदिर में उस समय पूजा कर रहे एक स्थानीय सज्जन ने बताया कि बहुत पहले राज घराने की महिलायें इसी दरवाजे से भीतर ही भीतर पूजा करने आती थी ऐसा कहा जाता है।
गर्भ गृह में प्रविष्ट होने वाले दरवाजे के सामने एक कुंआ है। इतनी ऊंचाई पर कूुंआ, सच अद्भुत । कुंए में पानी भी था और निकल भी रहा था। जमीन के स्तर पर पानी दिख भी रहा था. कहते हैं इसका पानी कभी नहीं सूखता। पानी से ध्यान आया कि जिन मेंढक महाराज की पीठ पर यह मंदिर बना है, उनका मुख खुला है और ऊपर सीढ़ीयों के जोड़ पर एक लाइन में कुछ ऐसे छेद बने हैं कि लगता है जैसे यब प्रबंध किया गया होगा कि जब शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाय तो वह अंत में मेंढक के मुंह से बाहर निकले।
मंदिर परिसर में चारों ओर काफी खुली जमीन है। एक तरफ कुंआ और हैंड पम्प हैं, पेड़ पौधे हैं और बहुत सारे बेल के पेड़ हैं। मंदिर की बाउंड्री की दीवार से लगे बाहर की ओर चारों तरफ ठाकुर द्वारे हैं। पहले कभी इनके दरवाजे मंदिर की ओर खुलते थे पर अब बंद हैं।
मंदिर के शिखर पर पीतल के कलश हैं । कलश पर चारों ओर गौ माता के मुख बने हैं। बताया जाता है कि एकदम शिखर पर कभी पूरा 'ऊं' लिखा था जो अब टूट कर आधा रह गया है।
मंदिर की दीवारों पर बनी आकृतियों मेंऔर भी बहुत कुछ था जो हम पूरी तरह समझ नहीं पाये । कुछ ऐसा भी कहा जाता है मंदिर के विषय में जो हम देख नहीं पाये। कहते हैं कि सूरज की किरणों के बदलते कोणों के संग शिव लिंग भी रंग बदलता है। यह भी सुना कि पहले मंदिर की छत सूरज के घूमने के साथ साथ घूमती दिखायी देती थी पर समय और प्रक़ृति की मार ने कुछ ऐसी क्षति कर दी है कि अब ऐसा नहीं होता है।
संरचना ही नहीं यह मंदिर मन में बहुत अलग सी अनुभूति भी जगाता है। गर्भगृह के भीतर सब कुछ शांत हो जाता है। बाहर बैठो तो मन जैसे भागता है पीछे की ओर जानने को बहुत कुछ --- कैसा रहा होगा वह समय, कौन होंगे वे लोग जिन्होंने निर्माण किया होगा मंदिर का। कौन थे वे तांत्रिक, यदि सच में थे तो। नहीं थे तो किसने सुझाया होगा यह अलग सा मंदिर बनाने को। यह भी सुनने में आया कि मंदिर निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। चारों ओर बनी बुर्जियों में एक एक में गणेश जी, कार्तिकेय जी, आदि की स्थापना होनी थी पर तांत्रिक महाराज की पूजा में कोई बाधा पड़ जाने से वह संभव नहीं हो पाया, इसीलिए वे खाली पड़ी हैं और प्रवेश निषेध है।
न जाने कितनी कहानियां, कितनी कथायें समेटे है अपने में यह मंदिर, पर सच नायाब है। अघाया नहीं हमारा मन। एक बार और जाना है और वह भी ज्यादा समय के लिए।
पता चला शिवरात्रि, दीपावली आदि में काफी बड़ा मेला लगता है यहां। बहुत भीड़ होती है ।उस समय कुछ अलग दृश्य रहता होगा ।
वैसे तो हम जब गए समय सही था। न ही भीड़ ज्यादा थी, न आपा धापी। बिल्कुल सुनसान भी नहीं था। क्षेत्रीय लोगों की आवाजाही थी ,जो काफी समय लगा कर विधि विधान से पूजा कर रहे थे। कुछ जोड़े बस यूं ही घूमने आये थे। कुछ अन्य प्रांतों के पर्यटक भी थे। एक बड़ा पारिवारिक समूह था, मराठी बोलता हुआ।
देखे फिर कब बुलाते हैं भोले बाबा, पर बुलाना जरूर.......................
सड़कें अच्छी बन गयीं हैं सो यात्रा में कोई परेशानी नहीं हुई। रास्ते में रुके चाय पीने झरेखापुर की एक दुकान पर, तिराहे के पास। तबियत खुश हो गयी बालक की बनाई चाय पी कर। भाई लोगों ने समोसा भी खाया और बहुत पसंद भी किया । उसी दुकान पर मिले एक सज्जन ने हरगांव के प्राचीन मंदिर की भी जानकारी दी और कहा जब यहां तक आये हैं तो लौटते में वहां भी हो लीजियेगा।
खैर, हम पहुंचे ओइल के मंदिर और सच मानिये, जीना चढ़ जैसे ही दरवाजे में घुसे कि कुछ पल तो अचम्भित खड़े रह गये। यह मंदिर अपने आप में हमारे शहर या प्रदेश में ही नहीं देश में भी अनूठा है।
मंदिर का निर्माण राय बख्त सिंह जो उस समय इलाके जमींदार थे, ने करवाया था। राय बख्त सिंह जी का देहांत 1838 में हो गया था । राय बख्त सिंह जी के वंशज अनिरुद्ध सिंह जी को 1849 में अवध के बादशाह द्वारा राजा की उपाधि प्रदान की गयी, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने वंशानुगत मान्यता प्रदान कर दी। आज भी वर्तमान
राजा विष्णु नारायण दत्त जी की कोठी ओइल में है और राजा एवं रानी साहिबा वहां अक्सर आते हैं। रंजीत के अनुसार राजा तो भोले शंकर हैं, अपने आप में रहते हैं पर रानी साहिबा को मंदिर के बाग की एक एक पत्ती की जानकारी है। खड़े हो के, भले ही धूप हो कि बरखा खुद ही निश्चित करती हैं कि कौन पौधा कहां लगेगा और किसे क्या तथा कितनी खाद दी जायेगी। जितने गर्व और प्रेम से वह रानी साहिबा के बारे में बात कर रहा था, साफ पता चल रहा था कि राजा- रानी अत्यंत लोकप्रिय हैं और गांव के लोगों के करीब भी।
हां तो बात मंदिर की हो रही थी। राय बख्श सिंह जी ने यह मंदिर एक तांत्रिक के संरक्षण में बनवाया था। मंदिर की संरचना, दीवारों पर उकेरी गयी आकृतियों को देख साफ पता चलता है कि यह मंदिर सामान्य से हट कर है। कुछ लोगों का कहना है कि अपनी प्रजा की भलाई के लिए यह मंदिर बनवाया गया था जिससे कि इलाके के लोग हमेशा धन-धान्य से परिपूर्ण रहें। कुछ लोगों का मानना था कि उन दिनों इलाका भंयकर सूखे की चपेट में था और मेघालय के इस कापालिक तांत्रिक के कहने पर वर्षा की कामना से मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया गया था। पता नहीं वास्तविक कारण क्या था। कापालिक तांत्रिक के संरक्षण में मंदिर निर्माण थोड़ा सामान्य से हट कर तो है पर इसीलिए तो हमें अपने क्षेत्र में इतना असाधारण मंदिर प्राप्त हो सका।
मंदिर के मुख्य आराध्य शंकर भगवान हैं। ऐसा कहा जाता है कि तांत्रिक के कहने पर ही राय बख्त सिंह जी मां नर्मदा में स्नान करने गये थे, जहां स्नान करते समय तांत्रिक के कहे अनुसार उन्हें धारा में ही यह शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसी कारण इस मंदिर में स्थापित शिव जी नर्मदेश्वर महादेव के नाम से जाने जाते हैं।
अब आइये बात करते हैं मंदिर की संरचना की। सम्पूर्ण मंदिर एक मेंढक की पीठ पर बना है। इस मंदिर को मंडूक मंदिर या मेंढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की संरचना तांत्रिक यंत्र पर आधारित है। मंदिर जमीन से तकरीबन 100 फीट की ऊंचाई पर है। सबसे नीचे मेंढक का आकार है जिसका मुख सामने की और और पिछला हिस्सा मंदिर के पीछे की और साफ साफ देखा जा सकता है. मेढक की आकृति के पैर दोनों ओर निकले हुए हैं। मेढक पर सीढ़ीयां यज्ञ की वेदी के आकार में बनी हैं । नीचे वाली तीन स्तर पर बनी सीढ़ीयां सत्व, रज और सम, प्रकृति के तीन मूल भूत तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। कहा जाता है हमारे पंच मूल भूत तत्व भी इन्हीं सूक्ष्म तत्वों से बने हैं। इनके ऊपर आठ और फिर सोलह दलों के कमल हों जैसे ,ऐसी आकृति है और उसके ऊपर मंदिर स्थापित है।
मेढक के चारों पैरों के पास दोमंजिला बुर्ज से बने हैं. इन सबकी बाहिरी दीवारों पर भी मुख्य मंदिर की भांति देवी, देवताओं, चौसठ योगिनियों के तथा अन्य बहुत से चित्र उकेरे हुए हैं । इन बुर्जों के भीतर जाने वाले दरवाजे पर ताला पड़ा था। यद्दपि बाहर से दूसरी मंजिल के भीतर बने रंगीन भित्ति चित्रों की झलक मिलती है ।
मंदिर के गर्भ गृह में घुसने के लिए बहुत छोटा सा दरवाजा है। झुक कर ही भीतर जाया जा सकता है। ठीक भी है, ईश्वर के समक्ष नत होना ही चाहिए। गर्भ गृह में बीच में करीब तीन फीट ऊंची सफेद संगमरमर की वेदी पर काले रंग के शिवलिंग स्थापित हैं और मंदिर की एक और विशेषता भी गर्भगृह में देखने को मिलती है। यहां शंकर भगवान के अनन्य भक्त नंदी महाराज खड़े हैं। धीरज की प्रतिमूर्ति शांत मना नंदी यहां बिल्कुल अलग स्वरूप में हैं। कदम आगे - पीछे महाराज कुछ आतुर से दिखते हैं। मंदिर की छत के चंदोवे में रंगीन चित्रकारी है। नंदी महाराज भी सफेद संगमरमर के ही बने हैं। गर्भ गृह में एक तरफ बड़ा सा घंटा लगा है और उसके पीछे एक छोटा दरवाजा है जो कि बंद रहता है। मंदिर में उस समय पूजा कर रहे एक स्थानीय सज्जन ने बताया कि बहुत पहले राज घराने की महिलायें इसी दरवाजे से भीतर ही भीतर पूजा करने आती थी ऐसा कहा जाता है।
गर्भ गृह में प्रविष्ट होने वाले दरवाजे के सामने एक कुंआ है। इतनी ऊंचाई पर कूुंआ, सच अद्भुत । कुंए में पानी भी था और निकल भी रहा था। जमीन के स्तर पर पानी दिख भी रहा था. कहते हैं इसका पानी कभी नहीं सूखता। पानी से ध्यान आया कि जिन मेंढक महाराज की पीठ पर यह मंदिर बना है, उनका मुख खुला है और ऊपर सीढ़ीयों के जोड़ पर एक लाइन में कुछ ऐसे छेद बने हैं कि लगता है जैसे यब प्रबंध किया गया होगा कि जब शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाय तो वह अंत में मेंढक के मुंह से बाहर निकले।
मंदिर परिसर में चारों ओर काफी खुली जमीन है। एक तरफ कुंआ और हैंड पम्प हैं, पेड़ पौधे हैं और बहुत सारे बेल के पेड़ हैं। मंदिर की बाउंड्री की दीवार से लगे बाहर की ओर चारों तरफ ठाकुर द्वारे हैं। पहले कभी इनके दरवाजे मंदिर की ओर खुलते थे पर अब बंद हैं।
मंदिर के शिखर पर पीतल के कलश हैं । कलश पर चारों ओर गौ माता के मुख बने हैं। बताया जाता है कि एकदम शिखर पर कभी पूरा 'ऊं' लिखा था जो अब टूट कर आधा रह गया है।
मंदिर की दीवारों पर बनी आकृतियों मेंऔर भी बहुत कुछ था जो हम पूरी तरह समझ नहीं पाये । कुछ ऐसा भी कहा जाता है मंदिर के विषय में जो हम देख नहीं पाये। कहते हैं कि सूरज की किरणों के बदलते कोणों के संग शिव लिंग भी रंग बदलता है। यह भी सुना कि पहले मंदिर की छत सूरज के घूमने के साथ साथ घूमती दिखायी देती थी पर समय और प्रक़ृति की मार ने कुछ ऐसी क्षति कर दी है कि अब ऐसा नहीं होता है।
संरचना ही नहीं यह मंदिर मन में बहुत अलग सी अनुभूति भी जगाता है। गर्भगृह के भीतर सब कुछ शांत हो जाता है। बाहर बैठो तो मन जैसे भागता है पीछे की ओर जानने को बहुत कुछ --- कैसा रहा होगा वह समय, कौन होंगे वे लोग जिन्होंने निर्माण किया होगा मंदिर का। कौन थे वे तांत्रिक, यदि सच में थे तो। नहीं थे तो किसने सुझाया होगा यह अलग सा मंदिर बनाने को। यह भी सुनने में आया कि मंदिर निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। चारों ओर बनी बुर्जियों में एक एक में गणेश जी, कार्तिकेय जी, आदि की स्थापना होनी थी पर तांत्रिक महाराज की पूजा में कोई बाधा पड़ जाने से वह संभव नहीं हो पाया, इसीलिए वे खाली पड़ी हैं और प्रवेश निषेध है।
न जाने कितनी कहानियां, कितनी कथायें समेटे है अपने में यह मंदिर, पर सच नायाब है। अघाया नहीं हमारा मन। एक बार और जाना है और वह भी ज्यादा समय के लिए।
पता चला शिवरात्रि, दीपावली आदि में काफी बड़ा मेला लगता है यहां। बहुत भीड़ होती है ।उस समय कुछ अलग दृश्य रहता होगा ।
वैसे तो हम जब गए समय सही था। न ही भीड़ ज्यादा थी, न आपा धापी। बिल्कुल सुनसान भी नहीं था। क्षेत्रीय लोगों की आवाजाही थी ,जो काफी समय लगा कर विधि विधान से पूजा कर रहे थे। कुछ जोड़े बस यूं ही घूमने आये थे। कुछ अन्य प्रांतों के पर्यटक भी थे। एक बड़ा पारिवारिक समूह था, मराठी बोलता हुआ।
देखे फिर कब बुलाते हैं भोले बाबा, पर बुलाना जरूर.......................
सभी चित्र -- कॉपीराइट सुंदर अय्यर
Monday, January 7, 2019
यहां वृक्ष भी प्रहरी हैं और समय भी
हमारे द्वारा लिखा गया यह यात्रा वृतांत दिसम्बर 1998 में , वाराणसी से अक समय निकलने वाली पत्रिका उपहार में प्रकाशित हुआ था। बस उसे यहां सहेज रहे हैं। यादों को जीने का एक और प्रयास।
केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम को जिक्र आते ही मन में ठाठें मारने सगता है दृश्टि की परिधि तक फैला सागर। चेतना पर छाने सगते हैं धरती आसमान के बीच हरियाली का सेतु बांधते नारियल। पर इसी शहर से मात्र साठ -सत्तर किलोमीटर दूरी पर है, एक छोटा सा पहाड़ी पर्यटक स्थल जिससे हम सब अभी बहुत परिचित नहीं हैं। तो चलिए आज चलते हैं स्वप्निल खामोशी में लिपटे, हवाओं के देश पुनमुड़ी में।
त्रिवेन्द्रम शहर की सीमा से निकल जब हम कदम बढ़ाते हैं पुनमुड़ी की चढ़ाई की ओर तो प्रथम पड़ाव पर हमारा साक्षात्कार होता है गोल्डेन वैली से। ऊंची-नीची चट्टानों, पहाड़ियों पर खड़े खड़े हरे- भरे, ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के बीच ऊपर से बह कर आती जलधारा एक कुंड सा बनाती है। पानी के नीचे बिखरी चट्टानोंने आपस में अपनी हथेलियां जोड़ ज्यों एक रेशमी चादर बिन रखी है और उस पर अलस पसरी है गुनगुनाती जलधारा।चारों ओर खड़े चिकने सशक्त तनों वाले पेड़ प्रहरी हैं, राजकन्या सी उस जलधारा के। ऊपर रास्ते से जलधारा तक पहुंचते पहुंचते आपकी अपनी आवाज भी स्वयंमेव वाथ छोड़ देगी और एक विमुग्ध खामोशी में लिपटे आप उतारते चले जायेंगे प्रकृति का होना अपने अंदर। पानी का स्पर्श ललचाता है पर इतना साफ और पारदर्शी है जल कि मन हिचकने लगता है उसमें पैर डालने से। पानी की धारा के दो किनारों पर खड़े हैं दो ऊंचे सतर पेड़और दोनों पेड़ों की एक-एक डाल कुछ इस तरह बढ़ी है एक दूसरे की ओर कि आपस में गुंथ गईं हैं और जलधारा की पूरी चौड़ाई में हवा में तन गया है एक प्राकृतिक पुल। नहीं आप इस पर चल नहीं सकते, छू भी नहीं सकते पर किनारों का यूं मिलना देख पाना ही अपने आप में क्या कम बड़ा अनुभव है।
थोड़ा और ऊपर चलते ही शुरू होता है सिलसिला छाय बागानों का। पतली सड़क पर चड़ती बस, ऊपर छाया चटक नीला आसमान, सड़क के दोनों ओर हरे भरे चाय बागान और चाय की पत्तियां चुनती, नीली, हरी, लाल, पीली साड़ियों में लिपटी, हरीतीमा के बीच इंद्रधनुष रचती महिलाएं। चाय की पत्तियां चुनती महिलाओं का फोटो खींचते समय मासूम अदा से मुस्कुरा देना एक और कड़ी जोड़ जाता है इस गीत में।
बस और आगे बढ़ती है। नीचे दृष्टि जाती है तो दूर दूर तक फैली हरी- भरी घाटियां जो दूर जा धुएं में गुम होती लगती हैं। ऊपर देखिए तो हर एक पहाड़ी का अपना एक अलग रूप। सामने पहाड़ी के सीने पर पांव रख अपना धानी आंचल लहराती हरियाली ु दूर ऊंची पहाड़ी की फुनगी पर कतार बांधे खड़े पेड़ या फिर बादलों से गलबहिया डाल बातें करती पहाड़ियां - सब मन में उत्सुकता जगाती हैं, कैसा होगा इनके फस पार बसा संसार।
हरियाली के बाच उगी, दूर से दिखती सपेद दीवारें और उन पर पसरी लाल छतें बता देती हैं कि हम अपने गंतव्य के करीब आ गए हैं। पुनमुड़ी में अभी कोई आबादी नहीं बसी है। गेस्ट हाउस, कुच कॉटेजेस, कैफेटेरिया, दुकानें , एक पार्क बस हरियाली के बीच इतने से ही मानव के हस्ताक्षर और सायद यही है पुनमुड़ी की खूबसूरती का राज-- आवाज नहीं, आहट नहीं, बस खामोशी गूंजती है, सन्नाटा बोलता है।
कैफेटेरिया की पारदर्शी दीवारों के पार हरियल घाटी में तिरते नीले बादलों को देखते - देखते अपना आप भी विस्मृत होने लगता है और सच मानिए हम गुम ही हो जाते उन घाटियों में अगर वेटर ने न ला रखा होता मेज पर गरम कॉफी का प्याला। हलियों के बीच सुखद उष्मा देता गर्म काफी का मग, अपनी गुनगुनी उंगलियों से चेहरा सहलाता काफी का धुआं और शीशे के उस पार नीले धुयें की खामोशी में लिपटी घाटियों में रूक रूक कर गिरती बूंदों की सिहरन जगाती ठंडक, दो विरोधी चीजें होते हुए भी साम्य की लय में बंधी हैं। इनसे साक्षात्कार यानि अंदर तक खुशबू में डूबना।
और फिर पुनमुड़ी का वह आखिरी सिरा, जहां बस यात्रियों को उतारती है।इस पहाड़ी सिरे से एक ओर दिखती है नीचे हरी भरी घाटियां और घाटियों की गोद में अलस गिरते आसमानी छाया में डूबे सफेद बादल। बादलों का भ्रम नहीं सचमुच के बादल। सर झुका कर अपने से नीचे बादलों को देखना एकदम चमत्कृत कर जाने वाली अनुभूति। कुछ नीचे उतर घाटियों की ओर बढ़ो तो दूर खड़े लोगों को लगेगा कि आप बादलों के बीच हो। मन करता है उछल कर किसी एक बादल के झूले पर लेट जांय और फिर हवा की धीमी धीमी थपकियों के बीच समेट लें यूं चारों ओर बिखरी शांति अपने भीतर।
पगडंडी के उस ओर पहाड़ी पर चढ़ना शुरू करेंगें आप तो एक दूसरे को धकियाते हवा के झोंके दौड़ के आ लिपटेंगें आपसे। पूरे वातावरण में हवा ने ज्यूं अनगिनित झूले बांध रखे हैं। पेंग भी नहीं भरनी पड़ती और आप हिंडोले पर सवार सवार जा पहुंचते हैं आसमान के पास। ऊबड़- खाबड़ रास्ते से होतो हुए जब पहाड़ी के सबसे ऊंचे सिरे पर जा बैठते हैं तो लगता है हम हवाओं के देश में हैं। चारों ओर खामोशी। पर यह सन्नाटा डराता नहीं है, अकेला भी नहीं कर जाता क्यों कि इसमें हवाओं की अबोली गूंज है। हवाएं तेज हैं पर तूफानी नहीं। पुनमुड़ी की खामोेशी और उसकी हवाओं की अपनी एक अलग ही शख्सियत है। वातावरण में रची बसी एक मीठी सी चुप जो पूरे जोर शोर से अपने होने का एहसास कराती है। आंख बंद कर महसूसें इस चुप को तो इसकी हर धड़कन में ज्यूं वंशी के सुर हैं, नुपुर की मध्यम रूनझुन है। कुछ ऐसा ही है मिजाज पुनमुड़ी की हवाओं का। हवाओं के सागर में आप हर लहर, हर झों के को अलग अलग पहचान सकते हैं। हर झोंका अपनी अलग जबान में बात करता है। कोई हाथ पकड़ दौड़ा ले चलेगा आपको ऊपर की ओर, कोई धीरे से आ गुजगुदा जाएगा, कोई बांध जाएगा आंचल का मूठ से अपनी मीठी याद, कोई गलबहिंया डाल कानों में गुनगुना जायेगा किसी भूले- बिसरे गीत की पहली कड़ी।
पुनमुड़ी में पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल के रूप में भले ही बहुत अधिक बिंदु न हो, उनके अलग अलग नाम न हो लेकिन समूची पुनमुड़ी की अपनी आत्मा है। पहाड़, हरियाली, बादल, हवा सबके अनूठे सामंजस्य से प्रकृति ने जो रूप रचा है वह दृष्टि से अधिक मन-प्राण को झंकृत करता है। पुनमुड़ी एक अनुभूति है जो जीवन पर्यंत आपकी धड़कनों में बसी रहेगी।
केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम को जिक्र आते ही मन में ठाठें मारने सगता है दृश्टि की परिधि तक फैला सागर। चेतना पर छाने सगते हैं धरती आसमान के बीच हरियाली का सेतु बांधते नारियल। पर इसी शहर से मात्र साठ -सत्तर किलोमीटर दूरी पर है, एक छोटा सा पहाड़ी पर्यटक स्थल जिससे हम सब अभी बहुत परिचित नहीं हैं। तो चलिए आज चलते हैं स्वप्निल खामोशी में लिपटे, हवाओं के देश पुनमुड़ी में।
त्रिवेन्द्रम शहर की सीमा से निकल जब हम कदम बढ़ाते हैं पुनमुड़ी की चढ़ाई की ओर तो प्रथम पड़ाव पर हमारा साक्षात्कार होता है गोल्डेन वैली से। ऊंची-नीची चट्टानों, पहाड़ियों पर खड़े खड़े हरे- भरे, ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के बीच ऊपर से बह कर आती जलधारा एक कुंड सा बनाती है। पानी के नीचे बिखरी चट्टानोंने आपस में अपनी हथेलियां जोड़ ज्यों एक रेशमी चादर बिन रखी है और उस पर अलस पसरी है गुनगुनाती जलधारा।चारों ओर खड़े चिकने सशक्त तनों वाले पेड़ प्रहरी हैं, राजकन्या सी उस जलधारा के। ऊपर रास्ते से जलधारा तक पहुंचते पहुंचते आपकी अपनी आवाज भी स्वयंमेव वाथ छोड़ देगी और एक विमुग्ध खामोशी में लिपटे आप उतारते चले जायेंगे प्रकृति का होना अपने अंदर। पानी का स्पर्श ललचाता है पर इतना साफ और पारदर्शी है जल कि मन हिचकने लगता है उसमें पैर डालने से। पानी की धारा के दो किनारों पर खड़े हैं दो ऊंचे सतर पेड़और दोनों पेड़ों की एक-एक डाल कुछ इस तरह बढ़ी है एक दूसरे की ओर कि आपस में गुंथ गईं हैं और जलधारा की पूरी चौड़ाई में हवा में तन गया है एक प्राकृतिक पुल। नहीं आप इस पर चल नहीं सकते, छू भी नहीं सकते पर किनारों का यूं मिलना देख पाना ही अपने आप में क्या कम बड़ा अनुभव है।
थोड़ा और ऊपर चलते ही शुरू होता है सिलसिला छाय बागानों का। पतली सड़क पर चड़ती बस, ऊपर छाया चटक नीला आसमान, सड़क के दोनों ओर हरे भरे चाय बागान और चाय की पत्तियां चुनती, नीली, हरी, लाल, पीली साड़ियों में लिपटी, हरीतीमा के बीच इंद्रधनुष रचती महिलाएं। चाय की पत्तियां चुनती महिलाओं का फोटो खींचते समय मासूम अदा से मुस्कुरा देना एक और कड़ी जोड़ जाता है इस गीत में।
बस और आगे बढ़ती है। नीचे दृष्टि जाती है तो दूर दूर तक फैली हरी- भरी घाटियां जो दूर जा धुएं में गुम होती लगती हैं। ऊपर देखिए तो हर एक पहाड़ी का अपना एक अलग रूप। सामने पहाड़ी के सीने पर पांव रख अपना धानी आंचल लहराती हरियाली ु दूर ऊंची पहाड़ी की फुनगी पर कतार बांधे खड़े पेड़ या फिर बादलों से गलबहिया डाल बातें करती पहाड़ियां - सब मन में उत्सुकता जगाती हैं, कैसा होगा इनके फस पार बसा संसार।
हरियाली के बाच उगी, दूर से दिखती सपेद दीवारें और उन पर पसरी लाल छतें बता देती हैं कि हम अपने गंतव्य के करीब आ गए हैं। पुनमुड़ी में अभी कोई आबादी नहीं बसी है। गेस्ट हाउस, कुच कॉटेजेस, कैफेटेरिया, दुकानें , एक पार्क बस हरियाली के बीच इतने से ही मानव के हस्ताक्षर और सायद यही है पुनमुड़ी की खूबसूरती का राज-- आवाज नहीं, आहट नहीं, बस खामोशी गूंजती है, सन्नाटा बोलता है।
कैफेटेरिया की पारदर्शी दीवारों के पार हरियल घाटी में तिरते नीले बादलों को देखते - देखते अपना आप भी विस्मृत होने लगता है और सच मानिए हम गुम ही हो जाते उन घाटियों में अगर वेटर ने न ला रखा होता मेज पर गरम कॉफी का प्याला। हलियों के बीच सुखद उष्मा देता गर्म काफी का मग, अपनी गुनगुनी उंगलियों से चेहरा सहलाता काफी का धुआं और शीशे के उस पार नीले धुयें की खामोशी में लिपटी घाटियों में रूक रूक कर गिरती बूंदों की सिहरन जगाती ठंडक, दो विरोधी चीजें होते हुए भी साम्य की लय में बंधी हैं। इनसे साक्षात्कार यानि अंदर तक खुशबू में डूबना।
और फिर पुनमुड़ी का वह आखिरी सिरा, जहां बस यात्रियों को उतारती है।इस पहाड़ी सिरे से एक ओर दिखती है नीचे हरी भरी घाटियां और घाटियों की गोद में अलस गिरते आसमानी छाया में डूबे सफेद बादल। बादलों का भ्रम नहीं सचमुच के बादल। सर झुका कर अपने से नीचे बादलों को देखना एकदम चमत्कृत कर जाने वाली अनुभूति। कुछ नीचे उतर घाटियों की ओर बढ़ो तो दूर खड़े लोगों को लगेगा कि आप बादलों के बीच हो। मन करता है उछल कर किसी एक बादल के झूले पर लेट जांय और फिर हवा की धीमी धीमी थपकियों के बीच समेट लें यूं चारों ओर बिखरी शांति अपने भीतर।
पगडंडी के उस ओर पहाड़ी पर चढ़ना शुरू करेंगें आप तो एक दूसरे को धकियाते हवा के झोंके दौड़ के आ लिपटेंगें आपसे। पूरे वातावरण में हवा ने ज्यूं अनगिनित झूले बांध रखे हैं। पेंग भी नहीं भरनी पड़ती और आप हिंडोले पर सवार सवार जा पहुंचते हैं आसमान के पास। ऊबड़- खाबड़ रास्ते से होतो हुए जब पहाड़ी के सबसे ऊंचे सिरे पर जा बैठते हैं तो लगता है हम हवाओं के देश में हैं। चारों ओर खामोशी। पर यह सन्नाटा डराता नहीं है, अकेला भी नहीं कर जाता क्यों कि इसमें हवाओं की अबोली गूंज है। हवाएं तेज हैं पर तूफानी नहीं। पुनमुड़ी की खामोेशी और उसकी हवाओं की अपनी एक अलग ही शख्सियत है। वातावरण में रची बसी एक मीठी सी चुप जो पूरे जोर शोर से अपने होने का एहसास कराती है। आंख बंद कर महसूसें इस चुप को तो इसकी हर धड़कन में ज्यूं वंशी के सुर हैं, नुपुर की मध्यम रूनझुन है। कुछ ऐसा ही है मिजाज पुनमुड़ी की हवाओं का। हवाओं के सागर में आप हर लहर, हर झों के को अलग अलग पहचान सकते हैं। हर झोंका अपनी अलग जबान में बात करता है। कोई हाथ पकड़ दौड़ा ले चलेगा आपको ऊपर की ओर, कोई धीरे से आ गुजगुदा जाएगा, कोई बांध जाएगा आंचल का मूठ से अपनी मीठी याद, कोई गलबहिंया डाल कानों में गुनगुना जायेगा किसी भूले- बिसरे गीत की पहली कड़ी।
पुनमुड़ी में पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल के रूप में भले ही बहुत अधिक बिंदु न हो, उनके अलग अलग नाम न हो लेकिन समूची पुनमुड़ी की अपनी आत्मा है। पहाड़, हरियाली, बादल, हवा सबके अनूठे सामंजस्य से प्रकृति ने जो रूप रचा है वह दृष्टि से अधिक मन-प्राण को झंकृत करता है। पुनमुड़ी एक अनुभूति है जो जीवन पर्यंत आपकी धड़कनों में बसी रहेगी।
इस लेख में लगे छाया चित्र सुंदर ने अपने निकॉन से रील से खींची थी । तब डि़जिटल कम से कम हम लोगों तक तो नहीं पहुंची थी।
Thursday, January 3, 2019
अक्सर ऐसा होता है कि हम दूर दूर तक घूम आते हैं। उन स्थानों के विषय में बहुत सारी जानकारी इक्ट्ठा कर लेते हैं, उनके विषय में चर्चाएं भी कर लेते हैं पर अपने आस - पास की बहुत सी खास जगहें, बातें अनदेखी, अनसुनी ही रह जाती हैं। जैसे कभी- कभी सड़कों पर कैंडल मार्च तो हम कर लेते हैं पर अपने ही घर के कोनों में दुबके बैठे अंधियारे तक हमारी नजर ही नहीं पहुंचती ।
ऐसा ही कुछ लगा हमें जब हमने देखा अपने शहर से कुछ किलोमीटर दूर कमलापुर में यह राधा- कृष्ण मंदिर।मंदिर का परिसर साफ सुथरा है पर उससे लगा रानी महल और उसके चारों ओर का बाग- बागीचा बहुत ही खस्ता हाल स्थिति में है। कुछ लोग रहने भी लगे हैं उसमें। कहा जाता है कि यह कसमाण्डा के राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति है। पास ही में उनके महल आदि भी हैं। रानी महल के पीछे एक बड़ा सा सीढियों वाला तालाब भी है और तालाब के दोनों ओर समाप्ति की ओर अग्रसर मंदिर भी । कितना अच्छा होता यदि किसी प्रकार इन्हें एक पर्यटक स्थल के रूप में सहेजा जा सकता। किंतु होंगी ऐसा करने में आने वाली कई बाधायें, तभी तो सब धीरे धीरे माटी में मिल रहा है। वैसे तो प्रकृति का नियम है जो आया है ,सो जायेगा, जो बना है ,वह ढहेगा। किंतु इन सबके बीच भी मंदिर ठीक अवस्था में है और उसकी अपनी कुछ विशेषतायें भी हैं।
ऐसा ही कुछ लगा हमें जब हमने देखा अपने शहर से कुछ किलोमीटर दूर कमलापुर में यह राधा- कृष्ण मंदिर।मंदिर का परिसर साफ सुथरा है पर उससे लगा रानी महल और उसके चारों ओर का बाग- बागीचा बहुत ही खस्ता हाल स्थिति में है। कुछ लोग रहने भी लगे हैं उसमें। कहा जाता है कि यह कसमाण्डा के राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति है। पास ही में उनके महल आदि भी हैं। रानी महल के पीछे एक बड़ा सा सीढियों वाला तालाब भी है और तालाब के दोनों ओर समाप्ति की ओर अग्रसर मंदिर भी । कितना अच्छा होता यदि किसी प्रकार इन्हें एक पर्यटक स्थल के रूप में सहेजा जा सकता। किंतु होंगी ऐसा करने में आने वाली कई बाधायें, तभी तो सब धीरे धीरे माटी में मिल रहा है। वैसे तो प्रकृति का नियम है जो आया है ,सो जायेगा, जो बना है ,वह ढहेगा। किंतु इन सबके बीच भी मंदिर ठीक अवस्था में है और उसकी अपनी कुछ विशेषतायें भी हैं।
Sunday, October 28, 2018
एक था कॉफी हाउस
उपन्यास और कहानियां भी एतिहासिक दस्तावेजों का काम करती हैं। स्थानीय स्थलों का तत्कालिक स्वरूप हो या क्षेत्रीय उत्सवों, मेलों का स्वरूप, प्रचलित सामाजिक अवधारणायें हो, या रीति रिवाज, कथाक्रम में पिरोए हुए होतें हैं और बरसों बाद भी हमें अपने विगत से जोड़े रहते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी स्थान का स्वरूप हमारे हमारे देखते देखते बदला होता है और फिर किसी किताब में उसके पुराने स्वरूप का जिक्र पढ़ते ही अपनी कुछ पुरानी यादों को हम दुबारा जी लेते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ अज्ञेय जी के नदी के द्वीप उपन्यास को एक बार फिर से पलटते हुए। पता नहीं आप में से कितनों को याद है हजरतगंज का पुराना कॉफी हाउस। जहां वर्तमान कैफे कॉफी डे है, उससे इनकमटैक्स आफिस की ओर चलने पर दो तीन दुकानों के बाद हुआ करता था। अब भी शायद नवीनीकरण के बाद उसका कोई छोटा संस्करण मौजूद है वहां। वैसे बहुत ठीक से पता नहीं है हमें। पुराने काफी हाऊस में भी भीतर जाने का हमारा अनुभव मात्र एक बार का है। जब हम लोग एक ट़्रेनिंग के सिलसिले में लखनऊ आए थे और उत्सुकतावश पूरा ग्रुप अंदर चला गया था । जानते हैं सबसे मजेदार बात क्या रही थी हम लोगों के लिए कि पौन घंटा भीतर बैठ गप्पे मारने के बाद भी बिना एक कप कॉफी पिए ही हम सब बाहर आ गए थे। हलां कि जो गजब का बहस- मुबाहिसा वाला माहौल था कि लग रहा था कि वहां हर व्यक्ति केवल बोलने बतियाने ही आया है और उसमें हम लोग आपस में बात चीत ज्यादा नहीं कर पाए थे, पर उन दिनों जब रेस्ट्रां में घुसना ही मध्यम वर्गीय लोगों के लिए रेयर टाइप की लक्जरी हुआ करती थी, भीतर बैठ कर बिना अधन्नी खर्चा किए बाहर आ जाना किसी थ्रिलिंग एडवेंचर से कम नहीं था हम लोगों के लिए। आइए, आपको ले चलते हैं कॉफी हाउस के उस माहौल में अज्ञेय जी की कलम के जरिए,
“चन्द्र का विश्वास था कि अच्छे पत्रकार के लिए कॉफी हाउस में घण्टों बिताना आवश्यक है – शहर में क्या हुआ है, क्या होने वाला है, क्या हो रहा है, सब कॉफी हाउस का वातावरण सूंघ लेने भर से भांप लिया जा सकता है। भुवन अनुभव करता था कि दूसरे पत्रकार भी ऐसा मानते हैं, क्यों कि वहां प्रायः उनका जमाव रहता था और सब वहां ऐसे कर्मरत भाव से निठल्ले बैठ कर , ऐसे अर्थ भरे भाव से व्यर्थ की बातें किया करते थे कि वह चकित हो जाता था.....”
छुटभइये नेता, पत्रकार , साहित्यकार बनने की प्रक्रिया में जुटे लोग, सबका जमावड़ा रहता था वहां । इंटरनेट के पन्ने नहीं होते थे न दिनों, पर आदान प्रदान की अनवरत सलिला प्रवाहित होती रहती थी ।
अब हमारे शहर में वह कॉफी हाउस नहीं है पर उसका जिक्र जिंदा है।
“चन्द्र का विश्वास था कि अच्छे पत्रकार के लिए कॉफी हाउस में घण्टों बिताना आवश्यक है – शहर में क्या हुआ है, क्या होने वाला है, क्या हो रहा है, सब कॉफी हाउस का वातावरण सूंघ लेने भर से भांप लिया जा सकता है। भुवन अनुभव करता था कि दूसरे पत्रकार भी ऐसा मानते हैं, क्यों कि वहां प्रायः उनका जमाव रहता था और सब वहां ऐसे कर्मरत भाव से निठल्ले बैठ कर , ऐसे अर्थ भरे भाव से व्यर्थ की बातें किया करते थे कि वह चकित हो जाता था.....”
छुटभइये नेता, पत्रकार , साहित्यकार बनने की प्रक्रिया में जुटे लोग, सबका जमावड़ा रहता था वहां । इंटरनेट के पन्ने नहीं होते थे न दिनों, पर आदान प्रदान की अनवरत सलिला प्रवाहित होती रहती थी ।
अब हमारे शहर में वह कॉफी हाउस नहीं है पर उसका जिक्र जिंदा है।
May 2018
तुंगभद्रा नदी किनारे की शाम । दूर परले सिरे पर सूरज अभी ऊंचे पेड़ों के झुरमुट से बाहर नहीं आया था लेकिन झींसी बारिश सी झरती उसकी मद्धम रौशनी में कांस की बालियां हीरे की कनी से जड़ी लग रहीं थीं। और कांस ही
क्यों काले पाथरों की चट्टानी काया भी जैसे उसकी नेहिल छुअन से तन्वंगी हो उठी थी।
हम लोग नदी के उस किनारे चट्टानॆ पर खड़े थे जहां इस पार से उस पार करती नावें आती जाती हैं। नदी के पाट में सूरज की झलमल लगभग उसी जगह कौंध रही थी जहां चट्टाने और कांस थी। कुल मिला कर वह हिस्सा हमें इतनी जबरदस्त रूप से आकर्षित कर कहा था कि हम खुद को रोक नहीं पाए और हाथ हाथ भर लम्बी घास के कीचड़ भरे मैदान को पार कर , नदी के किनारे किनारे चट्टानों तक जा पहुंचे। काफी बड़ी ऊंची चिकनी चट्टानें थीं और उस पर कांटों वाले जंगली पेड़ भी थे बीच बीच में जहां तहां चट्टानों के आस पास। पर भला मन का पगलाया उछाह कब हारा है इन बातों से तो अंततः हम चढ़ ही गए चट्टानों पर और सच मानिए पहुंच वहां मन एक साथ शांत और चंचल हो उठा। अरे वाह, कैसे नहीं सम्भव है ऐसा। कभी इमली, या अमिया की खटमिट्ठी चटनी नहीं खाई क्या। हां फिर, बिल्कुल वैसा ही मजा, जीभ तालू से लग चट्ट करे तो सनसनाता सा खट्टा और रस गोल गोल मुंह में घूम बूंद बूंद गले से आहिस्ता आहिस्ता उतरे वह वाला मीठा ।विरोधाभास भी एक अलग ही तरह की एडवेंचरस अनुभूति देते हैं।
हां तो, चट्टानों पर से नदी और दूर तक दिखाई दे रही थी। बीच बीच में पानी में पालथी मार बैठी शिलाओं से कुछ गुपचुप बतियाती, हाथ मिलाती, गले मिलती, नदी धीरे धीरे बही चली जा रही थी। सूरज अपनी इधर उधर भागती किरणों को बटोर पुटरिया में बांध लेने की कोशिश में था, आखिर घर वापस चलने की बेरा हो रही थी पर शैतान बच्चियों सी चंचल किरणें कभी नदी में छलांग लगा पानी में जलपरियों सी किल्लोल करने लगती , कभी कांश के झुरमुट में घुस उसे जहां तहां ऐसे गुदगुदातीं, ऐसे संवारतीं कि उसे खुद अपना आप अनचीन्हा लगने लगता।
संवारने की क्या कहें कांस भी अपनी उम्र के उस पड़ाव पर थी जब निखार महुआ के रस सा टपकता है। कुछ और उम्रदराज होने पर हीरे की कलगी सी ये बालियां, सन जैसे बालों वाली हो जाएगीं पर अभी तो सच्ची ऐसे झलमला रही थी उसकी काया कि मेरा मन कर रहा था कि उसकी हंसुली गढ़वा लें । कैसी सजेगी न गले में। गले का तो पता नहीं पर मन यह सोचते ही जगर मगर हो गया। जब भी हम बेतरतीब बिखरी प्रकृति के बीच होते हैं मन में ऐसी ही न जानें कितनी भोली भाली इच्छाएं लटपट भागी चली आती हैं और हमें अपनी दूधिया बौछारों में भिगो जाती हैं।
Hampi....2017...
क्यों काले पाथरों की चट्टानी काया भी जैसे उसकी नेहिल छुअन से तन्वंगी हो उठी थी।
हम लोग नदी के उस किनारे चट्टानॆ पर खड़े थे जहां इस पार से उस पार करती नावें आती जाती हैं। नदी के पाट में सूरज की झलमल लगभग उसी जगह कौंध रही थी जहां चट्टाने और कांस थी। कुल मिला कर वह हिस्सा हमें इतनी जबरदस्त रूप से आकर्षित कर कहा था कि हम खुद को रोक नहीं पाए और हाथ हाथ भर लम्बी घास के कीचड़ भरे मैदान को पार कर , नदी के किनारे किनारे चट्टानों तक जा पहुंचे। काफी बड़ी ऊंची चिकनी चट्टानें थीं और उस पर कांटों वाले जंगली पेड़ भी थे बीच बीच में जहां तहां चट्टानों के आस पास। पर भला मन का पगलाया उछाह कब हारा है इन बातों से तो अंततः हम चढ़ ही गए चट्टानों पर और सच मानिए पहुंच वहां मन एक साथ शांत और चंचल हो उठा। अरे वाह, कैसे नहीं सम्भव है ऐसा। कभी इमली, या अमिया की खटमिट्ठी चटनी नहीं खाई क्या। हां फिर, बिल्कुल वैसा ही मजा, जीभ तालू से लग चट्ट करे तो सनसनाता सा खट्टा और रस गोल गोल मुंह में घूम बूंद बूंद गले से आहिस्ता आहिस्ता उतरे वह वाला मीठा ।विरोधाभास भी एक अलग ही तरह की एडवेंचरस अनुभूति देते हैं।
हां तो, चट्टानों पर से नदी और दूर तक दिखाई दे रही थी। बीच बीच में पानी में पालथी मार बैठी शिलाओं से कुछ गुपचुप बतियाती, हाथ मिलाती, गले मिलती, नदी धीरे धीरे बही चली जा रही थी। सूरज अपनी इधर उधर भागती किरणों को बटोर पुटरिया में बांध लेने की कोशिश में था, आखिर घर वापस चलने की बेरा हो रही थी पर शैतान बच्चियों सी चंचल किरणें कभी नदी में छलांग लगा पानी में जलपरियों सी किल्लोल करने लगती , कभी कांश के झुरमुट में घुस उसे जहां तहां ऐसे गुदगुदातीं, ऐसे संवारतीं कि उसे खुद अपना आप अनचीन्हा लगने लगता।
संवारने की क्या कहें कांस भी अपनी उम्र के उस पड़ाव पर थी जब निखार महुआ के रस सा टपकता है। कुछ और उम्रदराज होने पर हीरे की कलगी सी ये बालियां, सन जैसे बालों वाली हो जाएगीं पर अभी तो सच्ची ऐसे झलमला रही थी उसकी काया कि मेरा मन कर रहा था कि उसकी हंसुली गढ़वा लें । कैसी सजेगी न गले में। गले का तो पता नहीं पर मन यह सोचते ही जगर मगर हो गया। जब भी हम बेतरतीब बिखरी प्रकृति के बीच होते हैं मन में ऐसी ही न जानें कितनी भोली भाली इच्छाएं लटपट भागी चली आती हैं और हमें अपनी दूधिया बौछारों में भिगो जाती हैं।
Hampi....2017...
पिछले कुछ दिनों से हमारा आंगन चूं चूं की लगातार चहक से दिन भर गुलजार रहने लगा है. दो तरह की आवाजें आती हैं, एक तो पाइप और दीवार के बीच बने घोसले से दो नवजात शिशुओं की जीवन जानने की उत्सुकता से भरी चहचहाहट और दूसरी आंगन ऊपर के जाल से नीचे को सतर्क नजर रखे मां पिता की चिंतातुर आवाजें जो किसी के भी आंगन में आते ही तेज हो जाती, कुछ कुछ बौखलाहट भी तारी हो जाती। शायद बच्चों को बिल्कुल चुप हो जाने का संकेत देने की कोशिश में रहते वे. पर बच्चे तो बच्चे ठहरे, उन्हें कब आगत का भय सताता है। दोनों शिशुओं की चहचहाहट बदस्तूर जारी रहती। या फिर कहें कि बच्चों को मन पहचानना बड़ों से ज्यादा आता है इसलिए वे निश्चिंत रहते।.उन्हें पता है कि इस आँगन में वे सुरक्षित हैं। आज उनमें से एक घोसले से नीचे उतर आए। आंगन में उस समय काम हो रहा था, बर्तन वगैरह धुलने का।उतर तो आये महाशय पर घर के बाहर पहला कदम कब आसान हुआ है। घबराए से, कुछ भौचक से बैठे थे, जब उन्हें कैमरे में सहेजा। और ऊपर जंगले से झांकते मां पिता की सांस अटकी थी । खैर जैसे ही आंगन खाली हुआ, मां दौड़ कर नीचे आयी। बार बार उड़ कर बच्चे को दिखाती कि कैसे उड़ कर ऊपर जंगले तक पहुंचना है। हम देख रहे थे, इनकी जिम्मेदारी तो हम लोगों से ज्यादा कठिन होती है. हम तो हाथ पकड़ कर चलना सिखा लेते हैं. ये तो केवल कर के दिखा पाती है पर शायद सिखाने का यही ज्यादा अच्छा तरीका है, कर के दिखाना। बहरहाल कई तरह के प्रयासों के बाद छुटकू जी आज खुली छत तक पहुंच गये. ईश्वर उन्हें लम्बी उड़ानों के सुख दें और उनके परों को आसमान नापने की ताकत.
12 April 2018
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