Wednesday, August 20, 2008

मेरी डायरी के पुराने पन्ने ......भाग.२

मसूरी के ग्रेवयार्ड के बाद उसी दिन हम मसूरी के प्रसिद्ध केम्प्टी फ़ाल भी गये .पहाड़ों पर से छलांग लगा वेग से कूदती जलधारायें अपने मरमरी संगीत से दिशायें गुंजा रहीं थीं .नीचे आ चट्टानो पर उछलती ,कूदती,फ़ांदती कहीं दूर आतुरता से भागती चली जा रही थी .ऊपर नीचे होती प्रवाह्मयी धाराओं को देख यूं लगता था कि भावनाओ के ज्वार से स्पंदित मन हो किसी अल्हड षोडशी का जो अपने आंचल में अपनी भावनायें समेटे भागी जा रही हो दूर अपने प्रियतम के आलंिगन मे सिमट जाने को .
सच कहें तो हमे अभिभूत कर गया होता प्रक्रिति का यह रूप यदि इसके जादुई सौन्दर्य को भंग करता मानवीय कोलाहल ना होता .जल प्रपात के नैसर्गिक संगीत के बीच टेप और ट्राइन्जिस्टर की आवाजें ,स्वच्छ ,पार्दर्शी जल को गंदला करते डबलरोटी के रैपर ,पूड़ी सब्जी के टुकड़े .वित्रिष्णा हो उठती है आदमी के इस लापर्वाहि भरे दंभ से .कितना सुखकर लगता किसी एक चट्टान पर चुपचाप बैठ ्खुद को खो देना इस अरण्य में.चारों ओर हरे भरे पहाड़,ऊपर तना नीला आकाश .चुप मे गुम हम भी शिला हो बन जाते प्रक्रिति का एक अंग .



कैमप्टी फ़ाल........१९८५



१६.०६.८५.
प्रातः चार बजे के अंधेरे आवरण में लिपटी मसूरी .हल्की सि ठंड की खुनक लिये चुटकियां काटती हवा .जहां पर हम लोग बस की प्रतीक्छा कर रहे थे,वहां से नीचे झांकने पर देह्रादून दिख्लाई पड़ता था .अंधेरे के आगोश मे दिप्दिपाते ज्योतिपुंज आकाश मे छिटके नखतों को प्रतिबिम्बित कर रहे थे .कतार से जलती बत्तियां ऊपर से देखने पर आलोक की एक लम्बी सतर सी लगती थी ज्यूं अंधेरे का दरिया पार करने को रौशनी का पुल बना दिया गया हो .
और फ़िर मसूरी से रिषिकेश तक का रास्ता .पहाड़ों को काट कर बनायी गयी सड़क पर बस उतरती चली जा रही थी .पहाड़ों पर तने खड़े पेड़ और कैसी विभिन्न वन्स्पतियां .धुले धुले हरे चिकने पत्ते,इठला कर चलती मीठी हवा .एक अजब सी मिठास और निष्पाप कोमलता का रस घुला समूचे वातावरण मॆं .


मसूरी......१९८५
रिशिकष का एक चक्कर मार घाटों के दूसरी ओर .गंगा पार बेतर्तीबी से बिखरी चट्टानों पर बैठे थे हम ,पानी मे पैर डाले. [कितना कम बसा और खुला खुला होगा ना तब रिशिकेष].गंगा का प्रवाह काफ़ी तेज था इस जगह पर.जिस स्थान पर बैठे थे हम लोग वहां से गंगा तीनों ऒर से घिरी दिख रही थी .एक ओर ऊंचाई पर बने रास्ते,सामने की ओर पर्वत श्रंखलायें और दायी ओर घाटो पर बनी इमारतें .ठीक सामने की ओर थी पर्वत श्रंखलायें और उनके चरणों से हम तक लहरा रहा था गंगा का चौड़ा पाट.धूप काफ़ी थी पर गंगा जल स्पर्श कर कोमल हो आयीं थी सूर्य की रश्मियां.पत्थरों पर उछलती कूदती गंगा जीवन से भर्पूर छलकती लग रही थी और कुछ ऐसा आकर्षक था उसका सौन्दर्य कि पहाड़ों के ऊपर चमकता सूरज मुट्ठी भर भर स्वर्ण मुद्रायें न्योछावर कर रहा था उस पर .लहरों से होड़ लेती हवा भी बेतहाशा चंचल हो उठी थी . आंचल, बालों से छेड़खानी करता म्रिदु पवन ,जीवन के उल्लास से छलकती लहरों का शीतल स्पर्श और आंखो के सामने मेरा प्रिय विस्तार ...गंगा के पाट का ,नीले आकाश का.ढेर सी कोमलता,स्निगधता भर आयी थी अंतर में .मन किया था बस यूं ही अलस तुष्टि से परिपूर्ण ह्रिदय लिये ,कंधे से सर टिकाये
निष्प्राण हो जायें .प्रत्येक अनुभुति त्रिपति की जो उगती है मेरे मन में ,प्रक्रिति के शांत सुखद सामीप्य से ,क्यों एक इक्छा जगाती है मन मे कि बस और अब जिंदगी नहीं .कुछ ऐसी चरम तुष्टि होती है कि उसके पाश को झटक उठ खड़े होने का मन नहीं करता.सम्मोहन की इन वादियों में खोया हुआ था मन कि सामने के एक द्रिश्य ने द्रिष्टी और मन दोनों को अपनी ओर खींच लिया .


रिशिकेश........१९८५
अब इस द्रिश्य का वर्णन अगले भाग में.............


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